-- शीत बढ़ा, सूरज शर्माया। आसमान में कुहरा छाया।। -- चिड़िया चहकी, मुर्गा बोला, जब हमने दरवाजा खोला, लेकिन घना धुँधलका पाया। आसमान में कुहरा छाया।। -- जाड़ा बहुत सताता तन को, कैसे जाएँ सुबह भ्रमण को, सर्दी ने है रंग जमाया। आसमान में कुहरा छाया।। -- गज़क-रेवड़ी बहुत सुहाती, मूँगफली सबके मन भाती, दादी ने अलाव सुलगाया। आसमान में कुहरा छाया।। गेंहूँ झूम-झूम लहराते, शीतल तुहिन कणों को खाते, हरियाली ने रूप दिखाया। आसमान में कुहरा छाया।। -- |
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आदरणीय,
जवाब देंहटाएंआपने तो इस प्यारे से बालगीत के माध्यम से बचपन की याद दिला दी।
बहुत शुक्रिया... और आभार इस गीत को ब्लॉग पर साझा करने के लिए
सादर,
डॉ. वर्षा सिंह
बहुत बढ़िया सर!
जवाब देंहटाएंगज़क-रेवड़ी बहुत सुहाती,
जवाब देंहटाएंमूँगफली सबके मन भाती,
दादी ने अलाव सुलगाया।
आसमान में कुहरा छाया।।
बचपन के आस्वाद को याद करते हुए में पानी आ गया...
बहुत कोमल रचना....
सादर नमन 🙏🌷🙏