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सोमवार, 2 मार्च 2009

याद बहुत आते हैं। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


गाँवों की गलियाँ, चौबारे,

याद बहुत आते हैं।

कच्चे-घर और ठाकुरद्वारे,

याद बहुत आते हैं।।


छोड़ा गाँव, शहर में आया,

आलीशान भवन बनवाया।

मिली नही शीतल सी छाया,

नाहक ही सुख-चैन गँवाया।

बूढ़ा बरगद, काका-अंगद,

याद बहुत आते हैं।।


अपनापन बन गया बनावट,

रिश्तेदारी टूट रहीं हैं।

प्रेम-प्रीत बन गयी दिखावट,

नातेदारी छूट रहीं हैं।

गौरी गइया, मिट्ठू भइया,

याद बहुत आते हैं।।


भोर हुई, चिड़ियाँ भी बोलीं,

किन्तु शहर अब भी अलसाया।

शीतल जल के बदले कर में,

गर्म चाय का प्याला आया।

खेत-अखाड़े, हरे सिंघाड़े,

याद बहुत आते हैं।।


चूल्हा-चक्की, रोटी-मक्की,

कब का नाता तोड़ चुके हैं।

मटकी में का ठण्डा पानी,

सब ही पीना छोड़ चुके हैं।

नदिया-नाले, संगी-ग्वाले,

याद बहुत आते हैं।।


घूँघट में से नयी बहू का,

पुलकित हो शरमाना।

सास-ससुर को खाना खाने,

को आवाज लगाना।

हँसी-ठिठोली, फागुन-होली,

याद बहुत आते हैं।।

19 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा आपने यह यादें अब बस यूँ ही साथ है ..अच्छा लिखा है आपने

    उत्तर देंहटाएं
  2. सास-ससुर को खाना खाने,

    को आवाज लगाना।

    हँसी-ठिठोली, फागुन-होली,

    याद बहुत आते हैं।।

    वाह वाह शाश्त्री जी क्या सही खाका खींचा है गांव और वहां की यादों का. साथ ही वहां की होली भी याद दिलादी. बहुत शुभकामनाएं आपको.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  3. शास्त्री जी ।
    आपने इस गीत में मेरे ही गाँव की
    तसवीर खींच कर रख दी।
    मुबारकवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्दर चित्र गीत के लिए
    बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  5. गाँवों की गलियाँ, चौबारे,
    याद बहुत आते हैं।
    कच्चे-घर और ठाकुरद्वारे,
    याद बहुत आते हैं।।

    इस गीत में गाँव का अच्छा
    वर्णन किया गया है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. उत्तम गीतों की श्रंखला में यह गीत
    अपना विशेष स्थान रखता है।
    आपका शब्द-चयन अच्छा है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. भोर हुई, चिड़ियाँ भी बोलीं,
    किन्तु शहर अब भी अलसाया।
    शीतल जल के बदले कर में,
    गर्म चाय का प्याला आया।
    खेत-अखाड़े, हरे सिंघाड़े,
    याद बहुत आते हैं।।

    गीत की ये लाइनें मन को छू गयी।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर।
    आपकी लेखनी को माँ सरस्वती
    का आशीर्वाद प्राप्त है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. मुझे ये लाइनें बहुत अच्छी लगीं।

    घूँघट में से नयी बहू का,
    पुलकित हो शरमाना।
    सास-ससुर को खाना खाने,
    को आवाज लगाना।
    हँसी-ठिठोली, फागुन-होली,
    याद बहुत आते हैं।।

    अच्छा गीत लिखने के लिए बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  10. bade bhai ji,
    bada kamaal ka likhte hain
    aap.jitni taareef karen kam hai.

    अपनापन बन गया बनावट,
    रिश्तेदारी टूट रहीं हैं।
    प्रेम-प्रीत बन गयी दिखावट,
    नातेदारी छूट रहीं हैं।
    गौरी गइया, मिट्ठू भइया,
    याद बहुत आते हैं।।

    उत्तर देंहटाएं
  11. यादों में डुबो दिया. उम्दा अभिव्यक्ति.

    उत्तर देंहटाएं
  12. सुंदरतम् कल्पना को नमन!

    यह उच्चारण पर प्रकाशित
    अब तक की श्रेष्ठ रचना है!

    कविता पढ़ने के बाद
    मन हुआ कि
    शहर छोड़कर
    तुरंत गाँव की ओर
    बढ़ने लगूँ!

    उत्तर देंहटाएं
  13. अच्छी रचना के लिए बधाई आप को

    उत्तर देंहटाएं
  14. बिलकुल सच ! लगा अपने ही मन के भाव पढ़ रही हूँ.....कचोट को इतनी सुन्दरता से अभिव्यक्ति दी है आपने कि क्या कहूँ..........बहुत बहुत बहुत ही सुन्दर गीत !!

    आभार..

    उत्तर देंहटाएं
  15. आपने तो बहुत सुंदर रचना लिखा है यादों को लेकर जो हमेशा हमारे पास रहेंगी! बेहद ख़ूबसूरत! मैं आपकी रचना में डूब गई और बचपन के सुनहरे दिनों को याद करने लगी!

    उत्तर देंहटाएं

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