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बुधवार, 4 मार्च 2009

तुम्हें प्यार नही करते हैं। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)



नैन मटकाते हैं ,

इजहार नही करते हैं।

सिर हिलाते है,

वो इन्कार नही करते हैं।


रोज टकराते हैं,

पगडण्डी पे आते-जाते,

इतने खुद्दार है,

इसरार नही करते हैं।


देखते हैं मुझे,

ऊपर से ही चोरी-चोरी,

क्यों है नफरत,

जो नजर चार नही करते हैं।


मैं पहल कैसे करूँ,

मेरी भी मजबूरी है,

कितने मगरूर हैं,

इकरार नही करते है।


कब तलक लोगे परीक्षा,

यूँ ही जज्बातों की,

जाओ पत्थर हो,

तुम्हें प्यार नही करते हैं।

11 टिप्‍पणियां:

  1. कब तलक लोगे परीक्षा,
    मेरे जज्बातों की,
    गर हो पत्थर,
    तो तुम्हें प्यार नही करते हैं।

    बेहतरीन गजल के लिए, एक ही लफ्ज है,
    जिन्दाबाद!

    जवाब देंहटाएं
  2. मन की कथा-व्यथा को
    अच्छी तरह बाँधा है।

    सुन्दर रचना।

    जवाब देंहटाएं
  3. जब कलम ही इतनी भावुक है,
    तो शेर तो जानदार होंगे ही,
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  4. सुन्दर गजल,
    सुन्दर शब्द,
    सुन्दर भाव।

    जवाब देंहटाएं
  5. जिन्दादिल गजल
    प्रकाशित करने के लिए शुक्रिया।

    जवाब देंहटाएं
  6. काश मैं भी इतना अच्छा लिख पाती।
    बहुत सुन्दर गजल है।

    जवाब देंहटाएं
  7. देखते हैं मुझे, ऊपर से ही चोरी-चोरी,क्यों है नफरत, जो नजर चार नही करते हैं।
    bahut khoob .

    जवाब देंहटाएं
  8. behtrin rachna............behtrin bhav.
    kab talak loge pariksha yun hi jazbaton ki,jao ptthar ho ,tumhein pyar nhi karte hain...........behtrin panktiyan.

    जवाब देंहटाएं

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