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शनिवार, 21 मार्च 2009

मेरी गुरूकुल यात्रा। (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)





बात लगभग 45 वर्ष पुरानी है। मेरे मामा जी आर्य समाज के अनुयायी थे। उनके मन में एक ही लगन थी कि परिवार के सभी बच्चें पढ़-लिख जायें और उनमें आर्य समाज के संस्कार भी आ जायें।

मेरी माता जी अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं और मैं अपने घर का तो इकलौता पुत्र था ही साथ ही ननिहाल का भी दुलारा था। इसलिए मामाजी का निशाना भी मैं ही बना। अतः उन्होंने मेरी माता जी और नानी जी अपनी बातों से सन्तुष्ट कर दिया और मुझको गुरूकुल महाविद्यालय, ज्वालापुर (हरद्वार) में दाखिल करा दिया गया।



घर में अत्यधिक लाड़-प्यार में पलने के कारण मुझे गुरूकुल का जीवन बिल्कुल भी अच्छा नही लगता था। मैं कक्षा में न जाने के लिए अक्सर नये-नये बहाने ढूँढ ही लेता था और गुरूकुल के संरक्षक से अवकाश माँग लेता था।



उस समय मेरी बाल-बुद्धि थी और मुझे ज्यादा बीमारियों के नाम भी याद नही थे। एक दो बार तो गुरू जी से ज्वर आदि का बहाना बना कर छुट्टी ले ली। परन्तु हर रोज एक ही बहाना तो बनाया नही जा सकता था।



अगले दिन भी कक्षा में जाने का मन नही हुआ, मैंने गुरू जी से कहा कि-‘‘गुरू जी मैं बीमार हूँ, मुझे प्रदर रोग हुआ है।’’ गुरू जी चौंके - हँसे भी बहुत और मेरी जम कर मार लगाई।



अब तो मैंने निश्चय कर ही लिया कि मुझे गुरूकुल में नही रहना है। अगले दिन रात के अन्तिम पहर में 4 बजे जैसे ही उठने की घण्टी लगी। मैंने शौच जाने के लिए अपना लोटा उठाया और रेल की पटरी-पटरी स्टेशन की ओर बढ़ने लगा। रास्ते में एक झाड़ी में लोटा भी छिपा दिया।



3 कि.मी. तक पैदल चल कर ज्वालापुर स्टेशन पर पहँचा तो देखा कि रेलगाड़ी खड़ी है। मैं उसमें चढ़ गया। 2 घण्टे बाद जैसे ही नजीबाबाद स्टेशन आया मैं रेलगाड़ी से उतर गया और सुबह आठ बजे अपने घर आ गया। मुझे देखकर मेरी छोटी बहन बहुत खुश हुई।



माता जी ने पिता जी के सामने तो मुझ पर बहुत गुस्सा किया लेकिन बाद में मुझे बहुत प्यार किया।



यही थी मेरी गुरूकुल यात्रा।

7 टिप्‍पणियां:

  1. दबाव से कुछ नहीं हो सकता , अच्छा ही हुआ जो आप घर आ गये ।

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. यह "प्रदर रोग हुआ है" का संस्मरण श्री प्रकाशवीर शास्त्री जी (संसद सदस्य व आर्यसमाज के प्रकाण्ड प्रखर तेजस्वी विद्वान)की जीवनी का है, जो ४०-५० साल पूर्व से, छपा हुआ उपलब्ध है।

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  4. आदरणीया बहिन कविता वाक्चनवी जी!
    आपने परम श्रद्धेय पं. प्रकाशवीर शास्त्री जी अपनी टिप्पणी में का उल्लेख किया है। पं0 जी तो मुझसे 20 वर्ष सीनियर थे। वह भी गुरूकुल महाविद्यालय, ज्वालापुर के स्नातक थे। अन्तर यह है कि वे यहाँ के स्नातक थे और मैं यहाँ का भगोड़ा हूँ। उनके जीवन में यह घटना मुझसे 20 वर्ष पूर्व घटित हुई होगी और मेरे साथ यह संयोग उनसे 20 वर्ष बाद हुआ । इसे संयोग ही कहा जा सकता हूँ। आप अपने स्थान पर सही हैं और मैं अपनी जगह।

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  5. aapki gurukul yatra ke bare mein jankar achcha laga.

    ek yatra aisi bhi
    hum kar gaye
    jahan jana nhi tha
    chale gaye
    jo karna nhi tha
    kar gaye

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  6. आपकी गुरु कुल यात्रा के बारे में पड कर लगा कि पहले के समय मे भी लॊग गुरू कुल से गोल मारते थे !

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