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सोमवार, 30 मार्च 2009

गुरूसहाय भटनागर बदनाम का एक गजल - प्रस्तुति- डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

स्मानी शायर गुरूसहाय भटनागर ‘‘बदनाम’’

दर्द के वर्क पर



दर्द के वर्क पर गीत हमने लिखे,


रोज़ ही हम उन्हें गुनगुनाते रहे।


गाहे आबादियाँ गाहे बीरानियाँ,


उनसे मिलने की यादें सजाते रहे।


नाम लिख-लिख के उनका हर रोज ही,


अपने दिल में उन्हें हम बसाते रहे।


उनकी खुश्यिों की खातिर कहाँ से कहाँ,


मंजिलों में भी महफिल सजाते रहे।


चल दिये छोड़ कर साथ कुछ इस तरह,


जिन्दगी भर हमें याद आते रहे।


बन के ‘बदनाम’ ओढ़ी है रूसवाइयाँ,


वो हमें हम उन्हें याद आते रहे।।

5 टिप्‍पणियां:

  1. बन के ‘बदनाम’ ओढ़ी है रूसवाइयाँ,

    वो हमें हम उन्हें याद आते रहे।।

    ye she'r bhi khub rahi ,wese to har she'r hi laajawaab hai ... badhaaeeyan..

    arsh

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही सुंदरतम रचना, पढवाने के लिये आभार.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बन के ‘बदनाम’ ओढ़ी है रूसवाइयाँ,
    वो हमें हम उन्हें याद आते रहे।।

    सुंदर रचना, पढवाने के लिये आभार.

    उत्तर देंहटाएं

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