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बुधवार, 1 अक्तूबर 2014

"ग़ज़ल-झूठ की तकरीर बच गयी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जल गये ख़तूत, पर तहरीर बच गयी
लुट गये असबाब, पर जागीर बच गयी

झेलें हैं बहुत हादसे, जीवन की जंग में
तदवीर काम आ गयी, तकदीर बच गयी

गैरों की दासताँ से तो, आजाद हो गये
बाँधी हुई अपनों की तो, जंजीर बच गयी

हम खा रहे हैं शौक से. भाषण के निवाले
महफिल में सिर्फ झूठ की, तकरीर बच गयी

पेड़ों की कोपलों पे, बुढ़ापा सा आ गया
लेकिन हमारे “रूप” की, तस्वीर बच गयी

1 टिप्पणी:

  1. सभी मित्रों को गांधी जयन्ती,लालबहादुर शास्त्री-जयन्ती,दुर्गापूजा एवं रामनवमी- पर्व की हार्दिक वधाई ! अच्छा प्रस्तुतीकरण !

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