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सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

"ग़ज़ल-बगीचे में ग़ुलों पर आब है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)


ज़िन्दगी इक खूबसूरत ख़्वाब है
रात में उगता हुआ माहताब है

था कभी ओझल हुआ जो रास्ता
अब नज़र आने लगा मेहराब है

आसमां से छँट गयीं अब बदलियाँ
अब खुशी का आ गया सैलाब है

पत्थरों में प्यार का ज़ज़्बा बढ़ा
अब बगीचे में ग़ुलों पर आब है

फूल पर मँडरा रहा भँवरा रसिक
एक बोसे के लिए बेताब है

 शाम ढलने पर कुमुद हँसने लगे
भा रहा कीचड़ भरा तालाब है

रोज़ आती रौशनी की रश्मियाँ
ख़्वाब का ये “रूप” भी नायाब है

6 टिप्‍पणियां:

  1. शाम ढलने पर कुमुद हँसने लगे
    भा रहा कीचड़ भरा तालाब है
    रोज़ आती रौशनी की रश्मियाँ
    ख़्वाब का ये “रूप” भी नायाब है
    ..बहुत सुन्दर ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. रोज़ आती रौशनी की रश्मियाँ
    ख़्वाब का ये “रूप” भी नायाब है...... बहुत खूब !

    उत्तर देंहटाएं
  3. अँधेरे को रौशनी देता हर एक शेर बेहतरीन !
    सादर !

    उत्तर देंहटाएं
  4. आदरणीय शास्त्री जी
    बहुत सुन्दर भाव ..प्यारी रचना .आसमां से छँट गयीं अब बदलियाँ
    अब खुशी का आ गया सैलाब है
    आप सपरिवार तथा मित्रों को भी दीपावली की ढेर सारी हार्दिक शुभ कामनाएं माँ लक्ष्मी और प्रभु गणपति उजाला और समृद्धि जीवन में भर दें
    भ्रम र ५

    उत्तर देंहटाएं

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