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गुरुवार, 9 अक्तूबर 2014

"दोहागीत-जीवन ललित-ललाम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

उपासना में वासना, मुख में है हरिनाम।
सत्संगों की आड़ में, होते गन्दे काम।।

कामी. क्रोधी-लालची, करते कारोबार।
राम नाम की आड़ में, दौलत का व्यापार।।
उपवन के माली स्वयं, कली मसलते आज।
आशाएँ धूमिल हुईं, कुंठित हुआ समाज।।
गुरूकुलों के नाम को, कर डाला बदनाम।
सत्संगों की आड़ में, होते गन्दे काम।१।

समय-समय की बात है, समय-समय के रंग।
जग में होते समय के, बहुत निराले ढंग।।
पल-पल में है बदलता, सरल कभी है वक्र।
रुकता-थकता है नहीं, कभी समय का चक्र।।
जीवन के इस खेल में, मत करना विश्राम।
सत्संगों की आड़ में, होते गन्दे काम।२।

वृक्ष बचाते धरा को, देते सुखद समीर।
लहराते जब पेड़ हैं, घन बरसाते नीर।।
समय भोग का चल रहा, नहीं योग का काल।
मानवता का “रूप” तो, हुआ बहुत विकराल।।
माँ-बहनों की लाज का, लोग लगाते दाम।
सत्संगों की आड़ में, होते गन्दे काम।३।

ओस चाटने से बुझे, नहीं किसी की प्यास।
जीव-जन्तुओं के लिए, जल जीवन की आस।।
पानी का संसार में, सीमित है भण्डार।
व्यर्थ न नीर बहाइए, जल जीवन आधार।।
पानी बिन होता नहीं, जीवन ललित-ललाम।
सत्संगों की आड़ में, होते गन्दे काम।४।

6 टिप्‍पणियां:

  1. कल 10/अक्तूबर/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (10.10.2014) को "उपासना में वासना" (चर्चा अंक-1762)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।दुर्गापूजा की हार्दिक शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  3. साधुवाद ! दोहा-गीत की परम्परा को पुरोगामी करने हेतु वधाई !!

    उत्तर देंहटाएं
  4. Ye harinaam ke nakaab ke niche ka chehara hai jo kabhi nazar aata hai kabhi nhi ...vastvikta yahi to hai . Bahut sunder prastuti !!

    उत्तर देंहटाएं

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