"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

रविवार, 5 अक्तूबर 2014

"नौका लहरों में फँसी, बेबस खेवनहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दोहागीत 
चिड़िया अपने नीड़ मेंकरती करुण पुकार।
सत्याग्रह सच्चे करेंराज करें मक्कार।।

आम जरूरत का हुआ, मँहगा सब सामान।
ऐसी हालत देख कर, जनता है हैरान।।
नेता रहते ठाठ से, मरते हैं निर्दोष।
पहन केंचुली हंस की, गिना रहे गुण-दोष।।
तेल कान में डाल कर, सोई है सरकार।
सत्याग्रह सच्चे करेंराज करें मक्कार।१।

बातें बहुत लुभावनी, नहीं इरादे नेक।
मछुआरे तालाब में, जाल रहे हैं फेंक।।
सब्जी और अनाज केबढ़े हुए हैं भाव।
अब तक भी आया नहीं, कीमत में ठहराव।।
निर्धन जनता के लिए, महँगाई उपहार।
सत्याग्रह सच्चे करें, राज करें मक्कार।२।

सबको अपनी ही पड़ी, जाये भाड़ में देश।
जनता को भड़का रहे, भर साधू का भेष।।
जनसेवक करने लगे, जनता का आखेट।
घोटाले करके भरें, मोटे अपने पेट।।
बात-बात में हो रही, आपस में तकरार।
सत्याग्रह सच्चे करें, राज करें मक्कार।३।

अपने झण्डे के लिए, डण्डे रहे सँभाल।
हालत अपने देश की, आज हुई विकराल।।
माँगा पानी जब कभी, लपटें आयीं पास।
जलते होठों की यहाँ, कौन बुझाये प्यास।।
कदम-कदम पर राह में, सुलग रहे अंगार।
सत्याग्रह सच्चे करें, राज करें मक्कार।४।

शाखा पर बैठा हुआ, पाखी गाता गीत।
कैसे उसका सुर सधे, बिगड़ गया संगीत।।
जनता के ही तन्त्र में, जनता की है मात।
धूप रूपकी ढल गयी, आयी काली रात।
नौका लहरों में फँसी, बेबस खेवनहार।
सत्याग्रह सच्चे करेंराज करें मक्कार।५।

9 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 6/10/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

    उत्तर देंहटाएं
  2. सबको अपनी ही पड़ी, जाये भाड़ में देश।
    जनता को भड़का रहे, भर साधू का भेष..........बहुत सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर सटीक गीत.... वाह वाह आंनद आ गया. बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  4. सटीक सामयिक गंभीर चिंतन भरी रचना.....

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह, इतनी सहजता से गंभीर बातें कहने की कला बहुत कम देखने मिलती है ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails