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शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

"ग़ज़ल-ढोलकी का सुर नगाड़ा हो गया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ज़िन्दग़ी जंग का अखाड़ा हो गया
दोस्त तेरह का पहाड़ा हो गया

अब हवाओं में ज़हर कितना भरा
दुश्मनी का रंग गाढ़ा हो गया

आदमी फ़िरकापरस्ती में घिरा
इंसानियत का तो कबाड़ा हो गया

भाइयों की बात पहुँची सड़क तक
ढोलकी का सुर नगाड़ा हो गया

अब नहीं है “रूप” अपनी सोच में
घर हमारा आज बाड़ा हो गया

5 टिप्‍पणियां:

  1. भाइयों की बात पहुँची सड़क तक
    ढोलकी का सुर नगाड़ा हो गया

    बहुत सुंदर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. भाइयों की बात पहुँची सड़क तक
    ढोलकी का सुर नगाड़ा हो गया
    अब नहीं है “रूप” अपनी सोच में
    घर हमारा आज बाड़ा हो गया
    ..बहुत सटीक सामयिक चिंतनशील रचना ..

    उत्तर देंहटाएं

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