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मंगलवार, 14 अक्तूबर 2014

"ग़ज़लिका-ज़िन्दग़ी में न ज़लज़ले होते" ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सबसे मिल कर अगर चले होते
आज इतने न फासले होते

कोई तूफां नहीं कभी आता
ज़िन्दग़ी में न ज़लज़ले होते

दिल में मायूसियाँ नहीं होतीं
ग़र बुलंदी पे हौसले होते

आप सबका भला अगर करते
आज सबके लिए भले होते

“रूप” इतना न घिनौना होता
फिर तरक्की के मरहले होते

4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ... बहुत ही लाजवाब शेरों से सजी ग़ज़ल ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. दिल में मायूसियाँ नहीं होतीं
    ग़र बुलंदी पे हौसले होते
    खूबसूरत गजल

    उत्तर देंहटाएं

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