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शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2014

"ग़ज़ल-कैसे आज बचाऊँ" ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
कुछ लिखकर चुप बैठूँ, या अन्तर्मन में कुछ गाऊँ!
अपनी व्यथा-कथा को, कैसे जग को आज सुनाऊँ!!

गली-गली हैं चोर-लुटेरे, पथ में छाया अँधियारा,
कौन डगर से अपने घर को, सही-सलामत जाऊँ!

अपनी झोली भरते जाते, सत्ता के सौदागर,
मँहगाई की मार पड़ी है, क्या कुछ खाऊँ-खिलाऊँ!

ग़ज़ल-गीत से मन भर जाता, पेट नहीं भरता है,
धन-दौलत की पौध खेत में, कैसे अब उपजाऊँ!

रिश्तेदारी नही रही अब, लोभी हुआ ज़माना,
वर के चढ़े भाव ऊँचे, उपहार कहाँ से लाऊँ!

महफिल में काले कौओं को, रूप परोसा जाता,
इन भोली-भाली चिड़ियों को, कैसे आज बचाऊँ!

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी ये रचना चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.in/ पर चर्चा हेतू 11 अक्टूबर को प्रस्तुत की जाएगी। आप भी आइए।
    स्वयं शून्य

    उत्तर देंहटाएं

  2. महफिल में काले कौओं को, “रूप” परोसा जाता,
    इन भोली-भाली चिड़ियों को, कैसे आज बचाऊँ!

    बहुत सुन्दर।

    उत्तर देंहटाएं

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