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गुरुवार, 23 अक्तूबर 2014

"खूबसूरत लग रहे नन्हें दिये" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

!! शुभ-दीपावली !!
तम अमावस का मिटाने को दिवाली आ गयी है।
दीपकों की रौशनी सबके दिलों को भा गयी है।।

जगमगाते खूबसूरत लग रहे नन्हें दिये,
लग रहा जैसे सितारे हों जमीं पर आ गये,
झोंपड़ी महलों के जैसी मुस्कराहट पा गयी है।
दीपकों की रोशनी सबके दिलों को भा गयी है।।


भवन की दीवार को बेनूर वर्षा ने करा था,
गाँव के कच्चे घरों का "रूप" बारिश ने हरा था,
रंग-लेपन से सभी में अब सजावट छा गयी है।
दीपकों की रोशनी सबके दिलों को भा गयी है।।


छँट गया सारा अन्धेरा पास और परिवेश का,
किन्तु भीतरघात से बदहाल भारत देश का,
प्यार जैसे शब्द को भी तो बनावट खा गयी है।
दीपकों की रोशनी सबके दिलों को भा गयी है।।


3 टिप्‍पणियां:

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