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शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

"!! शत्-शत् नमन !!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

"इन्दिरा! भूलेंगे कैसे तेरो नाम!" 

राष्ट्र-नायिका श्रीमती इन्दिरा गांधी को 
!! शत्-शत् नमन !!
मैंने 31 अक्टूबर, 1984 को लिखी थी यह कविता।
31 अक्टूबर, 1984 को 
जिन्होंने यह मंजर देखा होगा
वही इस रचना का 
मर्म समझ सकते हैं 
!! श्रद्धाञ्जलि़ !!
रोयें सारे नगर और गाम।
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!
इन्दिरा!
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!

तेरी हत्या पर नभ रोया,
रोये चाँद सितारे।
सारे तेरे विरोधी रोये,
रोये अपने सारे।
सब जन करते हैं तेरो गुणगान।
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!
इन्दिरा!
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!

तुलसी की मानस रोई और 
जायसी की अखरावट,
श्रीमति शिवा बावनी रोई
रोई है पद्मावत,
रोये नानक की वाणी,
सबह-औ-शाम।
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!
इन्दिरा!
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!

सूर कबीर के पद रोये
और रोईं हैं कुण्डलिया.
नरोत्तम के कृष्ण रोये थे,
रोईं उनकी मुरलिया,
रोये रसिक बिहारी के श्याम।
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!
इन्दिरा!
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!

स्वर्ग-लोक के सुर और दानव
करते क्रन्दन-क्रन्दन,
भारत के सब नर और नारी
करते तेरा वन्दन.
करते तुझको हैं शत्-शत् प्रणाम।
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!
इन्दिरा!
भूलेंगे कैसे तेरो नाम!

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अछा प्रस्तुतीकरण !
    इकत्तीस अकतूबर का दिन सं चौरासी !
    पूरे भारत भर में छाई घोर उदासी !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. इंदिराजी को सुंदर श्रद्धांजलि

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत भावभीनी श्रद्धांजलि !

    उत्तर देंहटाएं
  4. Maine wo waqt nhi dekha jab yah hatya hui to desh me kaisa mahoul tha sirf kuch log bataaye hain... Kintu aapke shabdo ne ahsaas dilayaa ki kitani peeda hui hogi jan-jan ko..... Bahut marmsparshi prastuti !!

    उत्तर देंहटाएं

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