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शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

“कंकरीटों ने मिटा डाला चमन” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

cowभूख से व्याकुल हुई मैंं जा रही हूँ।  
घास के बदले में कूड़ा खा रही हूँ।। 
याद आते हैं मुझे वो दिन पुराने। 
दूर तक मैदान थे कितने सुहाने।। 

cow_open_mouthed_and_reclinedपेट भर चारा उदर में बन्द था। 
उस जुगाली में बहुत आनन्द था।। 
अब चरागाहों में फैले हैं भवन। 
कंकरीटों ने मिटा डाला चमन।। 
अब वनों का खो गया अस्तित्व है। 
होम सारा हो गया अपनत्व है।। 
गाय-भैसों को मनुज खाने लगे। 
यूरिया का दूध अपनाने लगे।। 
दिल-जिगर के रोग अब बढ़ने लगे। 
सभ्यता से लोग अब लड़ने लगे।।

8 टिप्‍पणियां:

  1. एक अच्छी रचना।मन को छू गयी।

    my blog
    http://yuvaam.blogspot.in/2014_04_01_archive.html?m=0

    उत्तर देंहटाएं

  2. गौवें रूरत फिर रही, कहँ हैं पालन हार ।
    मंत्रियों ने बना दिया, उनको मच्छी मार ।१९८९।

    भावार्थ : -- गौवें तो ठोकर खाती फिर रही हैं, पालन हर कहाँ हैं । इस कुशासन ने उनको मच्छी मार बना दिया ॥

    दुष्ट नेता जी किसानों को कहते हैं, मछली पालो, खेती-वेती छोडो खेत हमें दे दो हम उन्हें उद्योग पतियों को देंगे । गौ-फौ पाल के क्या करोगे सेठ जी लोग तो घी दूध कहाँ खाते हैं वे तो दारु पीते हैं पशुओं की टाँग खाते हैं ॥

    उत्तर देंहटाएं
  3. क्या बात कही आप ने मित्र ! आज के युग में इस विचारधारा के प्रचार -प्रसार की ज़रूरत है !

    उत्तर देंहटाएं
  4. सत्य कहा आपने
    जिसके कारण 1857 की क्रांति हुई उसी गौ की दुर्दशा हो रही है आज।
    कुछ तो करना ही होगा
    गौ की दशा दिखाने का धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  5. Bahut marmsparshi... Gahan peeda hai shabdo me ... Yahi ho raha hai aajkal yatharth ka chitr ...gaay ki peeda ...umda prastutikaran !!

    उत्तर देंहटाएं
  6. बेहतर व लाभकारी रचना , धन्यवाद आ. !
    Information and solutions in Hindi ( हिंदी में समस्त प्रकार की जानकारियाँ )
    आपकी इस रचना का लिंक दिनांकः 3 . 11 . 2014 दिन सोमवार को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर दिया गया है , कृपया पधारें धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं

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