"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

सोमवार, 20 अक्तूबर 2014

"हिन्दी ब्ल़ॉगिंग-अपार सम्भावनाएँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मनुष्य सामाजिक प्राणी है और सामाजिक जीव होने के कारण उसके मन में रचनात्मकता सदैव चलती रहती है। जो लोग अपनी इस रचनात्मकता अभिव्यक्ति को शब्दों का रूप देकर सामने लाते हैं मेरे विचार से वही साहित्य कहलाता है। बहुत से लोग होते हैं जो अपनी वक्तृत्व कला के माध्यम से इसे समाज को परोस देते हैं लेकिन अधिकांश ऐसे भी होते हैं जो जिनके मन में विचार तो जन्म लेते हैं मगर वे अपनी गर्दन झटककर इसे नकार देते हैं।
    साहित्य अच्छा भी होता है और बुरा भी होता है। अर्थात जिस साहित्य को पढ़ने से हमारा सर्वांगीण विकास हो उसे हम सद्साहित्य की संज्ञा से अलंकृत करते हैं और जिसको पढ़ने से हमारे मन में विकृतियाँ जन्म लेती हैं उसे हम मात्र कुसाहित्य ही कह सकते हैं। विडम्बना यह है कि इण्डरनेट पर सभी प्रकार का माल सजा हुआ है। लेकिन आज हिन्दीब्लॉगिंग इण्टरनेट का वह स्थान है जिसमे ज्ञानार्जन और सामाजिक स्तर को उन्नत बनाने की सामग्री बहुतायत में निहित है।
    सन 2005 के बाद से हिन्दी ब्लागिंग का उद्भव हो गया था और हिन्दी ब्लॉगिंग का पौधा आज एक वृक्ष का रूप ले चुका है। जिससे न केवल समाज को दिशा मिलती है अपितु इससे तकनीकी और विकास की राह मिलनी प्रतीत होने लगी है। नये-नये अन्वेषण, नये-नये विषयों पर आलेख के साथ ही काव्य की गंगा भी हिन्दी ब्लॉगिंग में बह रही है।
    यहाँ यह भी उल्लेख करना चाहूँगा कि कुछ लोगों ने इसे एक नशा मानकर और अपने प्रतिदिन के जीवन अभिन्न का अंग बना लिया है। अगर मैं एक पंक्ति में अपनी बात कहूँ तो मेरे लिए ब्लागिंग नशा नहीं बल्कि आदत बन चुकी है।
     मेरे विचार से तो इण्टरनेट को पढ़ने के लिए अधिक प्रयोग में लाना चाहिए और उसके बाद ब्लॉगिंग करनी चाहिए। क्योंकि कहा जाता है कि अच्छा पाठक ही एक अच्छा लेखक और एक अच्छा वक्ता बन सकता है।
     इण्टरनेट एकमात्र ब्लॉगिंग का माध्यम है। ब्लॉगिंग में साहित्य की जो भी सामग्री दृष्टिगोचर होती है उसमें विभन्न स्थानों, विभिन्न देशों की संस्कृति की झलक मिलती है। चीन, जापान, अमेरिका, कनाडा, अरब, रूस आदि देशों में दिन्दी ब्लॉगिंग के पुरोधाओं की भरमार है। वे समय-समय पर अपने परिवेशों और संस्कृतियों की झलक पूरी दुनिया को दे रहे हैं। साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है परन्तु ब्लॉगिंग में समाज ही साहित्य का दर्पण बन गया है।
यहाँ यह भी उल्लेख करना जरूरी है कि चाहे वो ब्लॉगिंग हो या फेसबुक-ट्वीटर हो उनमें हिन्दी केवल यूनिकोड फॉण्ट के ध्यम से लिखी जाती है। इसके लिए आज अन्तर्जाल पर फॉण्ट परिवर्तक (कन्वर्टर) बहुत ती साइटों पर मौजूद हैं। गूगल ने भी गूगल इनपुट हिन्दी के माध्यम से यह सुविधा प्रदान की है कि यदि आप रोमन लिपि में कुछ टाइप करते हैं तो उसकी तत्काल हिन्दी बनती जाती है। यानि आज यूनिकोड तक पहुँचने के लिए काँटों भरे रास्ते समाप्त हो गये हैं।
     खुशी की बात यह है कि मोबाइलफोन, और टेबलेट अब हिन्दी टाइपिंग की सुविधा है। सच तो यह है कि हिन्दी ब्लॉगिंग पालने में दहाड़ता हुआ पूत है। पहले कार्टूनों की दुनिया सिर्फ अंग्रेजी की मुहताज थी लेकिन आज बहुत सारे ब्लॉगर आज अपने कार्टूनों हिन्दी में बना रहे हैं। ब्लॉगिंग वैसे तो आभासी दुनिया है लेकिन यह आभासी दुनिया स्वार्थपरायण वास्तविक दुनिया से लाखगुना बेहतर है। कनाडा में प्रवास कर रहे हिन्दी के जाने-माने ब्लॉगर समीर लाल जी  कहते हैं कि हिन्दी ब्लॉगिंग एक छोटा संसार है। मगर प्रसन्नता की बात है कि आज यह संसार वटवृक्ष का रूप ले चुका है।
    ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इंटरनेट पर उपलब्ध गूगल ट्रांसलेटर ने इसे और भी व्यापक बना दिया है। जिसके कारण विदेशों में बसे अन्य भाषा-भाषी भी आपकी अभिव्यक्ति को आसानी से समझ सकते हैं।
ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आप अपने द्वार प्रकाशित लेख-आलेख और काव्य में परिवर्तन, परिवर्धन और सुधार भी कर सकते हैं। जबकि पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तक के छप जाने के बाद यह सम्भव नहीं है।
    जहाँ तक हिन्दी ब्लॉगिंग में बाल साहित्य का प्रश्न है तो उसमें अभी गिनती के लोग ही अपनी लेखनी चला रहे हैं।
    मैं स्वयं बाल साहित्य के दो ब्लॉग “नन्हें सुमन” और “हँसता गाता बचपन” आज भी अनवरत रूप से चला रहा हूँ। कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव भी अपने ब्लॉगों के माध्यम से बाल साहित्य को जन-जन तक पहुँचा रहे हैं। डॉ.नागेश पाण्डेय संजय, जाकिर अली रजनीश, डॉ.हेमन्त श्रीवास्तव, पूनम श्रीवास्तव, रावेन्द्रकुमार रवि, चैतन्य का कोना, बालकुंज, बच्चों का कोना, लिटिल फिंगर, पार्थवी, गोलू गाये बुलबुल नाचे, चकमक, जादू, नन्हीं लेखिका, नानी की चिट्ठियाँ, पंखुरी टाइम्स, बच्चों की दुनिया, नन्हीं परी, चकमक चुलबुल, लाडली, अक्षयांसी आदि बहुत सारे बच्चों के ब्लॉग हैं। लेकिन दुःख की बात है कि वे आज सरक-सरककर चल रहे हैं। इसका मुख्यकारण यह है कि उनको समाज का समुचित प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है।

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवार के - चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. ये मंच इनकी आपस की चर्चाओं से ही सजा रहता है.....

      हटाएं
  2. Blogging ke baare me itna sab kuch padhne mila rochak jaankari... Aapse anurodh hai bal sahity ke bloggers ko bhi charchamanch me samy samay par dete raha karein waise hum jyada nhi aa paate wahan par lekin hum koshish karenge ki wahan niranter apni upasthiti darj karwaayein ... Bahut sahi kaha aapne jab tak hum acche paathak nhi bante acche lekhak banna sambhav nhi hai.. aapka aabhaar !!

    उत्तर देंहटाएं
  3. Blogging ka sabse bada fayada h ki apni rachnaon k prakashan k liye hume publishers ka sahara nahin lena padta.......

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails