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सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

"दोहागीत-धर्म हुआ मुहताज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

2250वीं पोस्ट
हैवानों की होड़ अब, करने लगा समाज।
खौफ नहीं कानून का, बदले रस्म-रिवाज।।

लोकतन्त्र में न्याय से, होती अक्सर भूल।
कौआ मोती निगलता, हंस फाँकता धूल।।
धनबल-तनबल-राजबल, जन-गण रहे पछाड़।
बच जाते मक्कार भी, लेकर शक की आड़।।
माँ-बहनों के रूप की, लगती बोली आज।
खौफ नहीं कानून का, बदले रस्म-रिवाज।१।

मोटी रकम डकार कर, करते बहस वकील।
गद्दारों के पक्ष में, देते तर्क-दलील।।
नर-नारी की खान को, अबला रहे पुकार।
बेटों को तो लाड़ हैं, बेटी को दुत्कार।।
सिंह मानसर में गये, बगुले करते राज।
खौफ नहीं कानून का, बदले रस्म-रिवाज।२।

पुरुषप्रधान समाज में, नारी का अपकर्ष।
अबला नारी का भला, कैसे हो उत्कर्ष।।
बेमन से मनते यहाँ, घर में पुत्री पर्व।
बेटी पर करते नहीं, लोग आज भी गर्व।।
भोली चिड़ियों को यहाँ, लील रहे हैं बाज।
खौफ नहीं कानून का, बदले रस्म-रिवाज।३।

सपनों की सुन्दर फसलअरमानों का बीज।
कल्पनाओं से हो रहीमन में अब तो खीझ।।
बेमौसम की आँधियाँदिखा रही औकात।
कैसे डाली पर टिकेंआज पुराने पात।।
पागल यौवन शान से,  मना रहा ऋतुराज।
खौफ नहीं कानून काबदले रस्म-रिवाज।४।

गुलदस्ते में अमन के, अमन हो गया गोल।
कौन हमारे चमन में, छिड़क रहा विषघोल।।
धर्म वहाँ कैसे टिके, जहाँ घृणित हों काम।
काम-पिपासा बढ़ रहीदेख रूपका घाम।।
कर्मों की गति देख कर, धर्म हुआ मुहताज।
खौफ नहीं कानून का, बदले रस्म-रिवाज।५। 

5 टिप्‍पणियां:

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