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मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

"धड़ाधड़ ओले पड़े" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



ब भी सिर को है मुंडाया, धड़ाधड़ ओले पड़े।
जब भी पग को है बढ़ाया, राह में गोले पड़े।।


माँ ने दी थी सीख, मिलकर साथ में रहना सभी,
बोल कड़वे तुम कभी भी, किसी से कहना नही,
शोध पर प्रतिशोध छाया, क्रोध के शोले बढ़े।
जब भी पग को है बढ़ाया, राह में गोले पड़े।।


मित्रता कैसे निभे, जब स्वार्थ रग-रग में भरा,
जहर से सींचा हुआ,  पादप नही होगा हरा,
रंग में भँग आजकल के दोस्त हैं घोले खड़े।
जब भी पग को है बढ़ाया, राह में गोले पड़े।।


झूठ की पाकर गवाही, सत्यता है जेल में,
हो गयी भीषण लड़ाई, दम्भ के है खेल में,
होश है अपना गँवाया, बे-वजह भोले अड़े।
जब भी पग को है बढ़ाया, राह में गोले पड़े।।


दुर-नीति से हारी विदुर की नीति है,
छल-कपट भारी, कुटिल सब रीति है,
शस्त्र लेकर सन्त आया, ज्ञान गठरी में सड़े।
जब भी पग को है बढ़ाया, राह में गोले पड़े।।

23 टिप्‍पणियां:

  1. शास्त्री जी नमस्कार ,
    ब भी सिर को है मुंडाया, धड़ाधड़ ओले पड़े।
    जब भी पग को है बढ़ाया, राह में गोले पड़े।।

    यही होता है आज इस दौर में

    उत्तर देंहटाएं
  2. हक़ीक़त बयां कर दी आपने शास्त्री जी।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आज के परिवेश के अनुसार एकदम सटीक रचना !
    बहुत बहुत बधाईयां !

    उत्तर देंहटाएं
  4. दुर-नीति से हारी विदुर की नीति है,

    छल-कपट भारी, कुटिल सब रीति है,

    शस्त्र लेकर सन्त आया, ज्ञान गठरी में सड़े।

    जब भी पग को है बढ़ाया, राह में गोले पड़े।।

    बहुत बढिया, एकदम सटीक !

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही सारगर्भित और सटीक रचना........

    मित्रता कैसे निभे, जब स्वार्थ रग-रग में भरा,
    जहर से सींचा हुआ, पादप नही होगा हरा,
    रंग में भँग आजकल के दोस्त हैं घोले खड़े।
    जब भी पग को है बढ़ाया, राह में गोले पड़े।।

    वाह वाह ...........बधाई !

    उत्तर देंहटाएं
  6. एक दम सटीक जी बहुत सुंदर.
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  7. इतने प्यारे ढंग से सच्चाई बयां कर दी आपने....

    उत्तर देंहटाएं
  8. मित्रता कैसे निभे, जब स्वार्थ रग-रग में भरा,
    जहर से सींचा हुआ, पादप नही होगा हरा,
    रंग में भँग आजकल के दोस्त हैं घोले खड़े।
    जब भी पग को है बढ़ाया, राह में गोले पड़े।।

    अरे वाह शास्त्री जी..बार बार गुनगुना रहा हूँ क्या सुंदर कविता प्रस्तुत की..बहुत बहुत बधाई!!!

    उत्तर देंहटाएं
  9. सुन्दर रचना के लिए दिल से बधाई!!

    उत्तर देंहटाएं
  10. वाह बहुत बढ़िया और सठिक रचना लिखा है आपने! बिल्कुल सच्चाई को शब्दों में पिरोया है !

    उत्तर देंहटाएं
  11. शस्त्र लेकर सन्त आया, ज्ञान गठरी में सड़े।
    इस बात के अनेक अर्थ निकलते है। यह हमारे जीवन के नियामकों के वास्तविक चरित्र का सही आकलन है ।

    उत्तर देंहटाएं
  12. मित्रता कैसे निभे, जब स्वार्थ रग-रग में भरा,
    जहर से सींचा हुआ, पादप नही होगा हरा,
    आपकी खासियत है कि आप सरल शब्दो मे जीवन के सार को व्यक्त कर जाते है.
    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  13. शास्त्री जी, इस बेहतरीन रचना के लिए आपको साधुवाद!!

    उत्तर देंहटाएं
  14. "झूठ की पाकर गवाही, सत्यता है जेल में,
    हो गयी भीषण लड़ाई, दम्भ के है खेल में,
    होश है अपना गँवाया, बे-वजह भोले अड़े।
    जब भी पग को है बढ़ाया, राह में गोले पड़े ।"

    बहुत ही सशक्त अभिव्यक्ति ।
    आभार ।

    उत्तर देंहटाएं
  15. " bahut hi accchi rachana .."

    -----eksacchai { AAWAZ }

    http://eksacchai.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  16. मित्रता कैसे निभे, जब स्वार्थ रग-रग में भरा,
    जहर से सींचा हुआ, पादप नही होगा हरा

    वाह शास्त्री जी, क्या बात कही है...ऐसा लगता है कि आपने वर्तमान की नब्ज़ पकड़कर ही यह अबिव्यक्ति दी है....

    उत्तर देंहटाएं
  17. मित्रता कैसे निभे, जब स्वार्थ रग-रग में भरा,
    जहर से सींचा हुआ, पादप नही होगा हरा
    इस सुन्दर रचना के लिये बधाई और आपकी कर्मठता को भी सलाम। दीपावली की शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  18. सत्‍यता के बेहद निकट यह रचना बहुत ही अच्‍छी लगी, आभार

    उत्तर देंहटाएं

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