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गुरुवार, 22 अक्तूबर 2009

"हरा नही हो सकता हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")




पागल तो हो सकता हूँ, 
पर डरा हुआ नही हो सकता।
निद्रा में हो सकता हूँ, 
पर मरा हुआ नही हो सकता।।


जो परिवेशों में घटता है,
उसको ही मैं गाता हूँ।
गूँगे-बहरे से समाज को,
लिख-लिखकर समझाता हूँ।।
अच्छा तो हो सकता हूँ,
पर बहुत बुरा नही हो सकता।।


मैं दरख़्त का पीला पत्रक,
मद्धम सुर में गाता हूँ।
भोजन का अम्बार लगा है,
फिर भी मैं नही खाता हूँ।।
सूखा तो हो सकता हूँ,
पर पुनः हरा नही हो सकता।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. हर शब्‍द बहुत ही गहराई लिये हुये एक भावमय प्रस्‍तुति जिसके लिये आपका आभार ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर शास्त्री जी , अति सुन्दर ......
    आप से मै कब से पुछ रहा हु इतनी कविता का राज क्या है? :)

    उत्तर देंहटाएं
  3. सूखा तो हो सकता हूँ,
    पर पुनः हरा नही हो सकता।।
    बडी ही सहजता से कितनी अच्छी बाते कह जाते है आप ........और गहरी भी!

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत गहरी बात कह दी आज !
    बहुत सुंदर रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  5. कितनी सुंदर बात कह डाली आपने कविता के माध्यम से ..एक संदेश देती हुई सुंदर कविता..बधाई शास्त्री जी!!

    उत्तर देंहटाएं
  6. शास्त्रीजी,
    अभी से 'पीला पत्रक' न कहिये, जो इतना जीवंत है, वह पीला पत्रक कैसे हो सकता है ?
    'दरख़्त का पीला पत्रक,
    मद्धम सुर में गाता हूँ।'
    मद्धम सुर में गाइए, लेकिन 'बहुत बुरे' तो क्या, बिलकुल बुरे नहीं हो सकते ! सच बोलने का साहस भी कितनों के पास होता है ?
    सादर--आ.

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह बहुत ही गहरे भाव के साथ आपने शब्दों में पिरोया है! शानदार रचना!

    उत्तर देंहटाएं

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