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गुरुवार, 15 जनवरी 2015

"कायदे से धूप अब खिलने लगी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कायदे से धूप अब खिलने लगी है।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।

दे रहा मधुमास दस्तक, शीत भी जाने लगा,
भ्रमर उपवन में मधुर संगीत भी गाने लगा,
चटककर कलियाँ सभी खिलने लगी हैं।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।

कल तलक कुहरा घना था, आज बादल छा गये,
सींचने आँचल धरा का, धुंध धोने आ गये,
पादपों पर हरितिमा खिलने लगी है।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।

सब पुरातन पात पेड़ों से, स्वयं झड़ने लगे हैं,
बीनकर तिनके परिन्दे, नीड़ को गढ़ने लगे हैं,
अब मुहब्बत चाके-दिल सिलने लगी है।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।


8 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर और स्वागत योग्य रचना महोदय ,स्वागत है इन पंक्तिओं से आप की रचना का

    हर चमन गुलज़ार है चांदनी हसने लगी है
    बादे-सबा भी मुस्कुरा कर आज कुछ कहने लगी है
    देख कर सुन्दर सलोना रूप मौसम का
    तितलियां भी आज देखो फूल से कुछ कहने लगीं है

    उत्तर देंहटाएं
  2. कल तलक कुहरा घना था, आज बादल छा गये,
    सींचने आँचल धरा का, धुंध धोने आ गये,
    प्रकृति का अदभुत चित्रण
    बहुत सुंदर --

    क्षमा चाहता हूँ कि देर से आता हूँ
    सादर
    मेरे ब्लॉग में भी पधारें

    अम्मा का निजि प्रेम -------

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (16.01.2015) को "अजनबी देश" (चर्चा अंक-1860)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुंदर प्रवाहमयी रचना...मंगलकामनाएँ

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी लेखनी तो ऊर्जा की प्रतिमूर्ति है। मौसम चाहे जो भी हो..प्रवाह तो आपका अनुकरणीय है। सहज और सुन्दर गीत।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर प्रकृति वर्णन ..प्रकृति और लेखनी.. दोनों में उर्जा भरपूर है !
    संत -नेता उवाच !
    क्या हो गया है हमें?

    उत्तर देंहटाएं

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