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रविवार, 18 जनवरी 2015

"गीत-बिन पानी का घन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


झूठे-वादेकोरे-नारेझूठा सब अपना-पन है।
तारों की महफिल मेंखद्योतों का निर्वाचन है।

रंग-बिरंगे झण्डे फहराने की  होड़ लगी है,
नेताओं की गलियों-चौराहों पर दौड़ लगी है,
टेढ़ा-पाजामा झुककर अब करने लगा नमन है।
तारों की महफिल मेंखद्योतों का निर्वाचन है।।

अपनी माँद छोड़कर सड़कों पर निकले गिरधारी,
भीख माँगने वोटों की आये हैं आज भिखारी,
झूठे वादों और इरादों से ग़ुलज़ार चमन है।
तारों की महफिल मेंखद्योतों का निर्वाचन है।।

पाँच साल जम कर लूटाअब लुट जाने के दिन हैं,
मत पाने की खातिरजूतों को खाने के दिन हैं,
कुर्सी की खातिर होता अबपूजा-भजन-यजन है।
तारों की महफिल मेंखद्योतों का निर्वाचन है।

देख चुनावी आफत को, दिल धक-धक जब होता है,
थूक लगाकर आँखों में, हर मुफ्तखोर रोता है,
रूखा-सूखा, नंगा-भूखाबिन पानी का घन है।
तारों की महफिल मेंखद्योतों का निर्वाचन है।।

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर रचना.आज की हकीकत नजर आती है.

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  2. सटीक सामयिक प्रस्तुति ..
    चुनाव में जनता से कहते हैं की हम जनता के सेवक हैं और फिर जनता को सेवक बना देते हैं ..जनता चक्कर काट काट कर हैरान परेशान ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. सीधी-सपाट बात शब्दों के मुलम्मे में...बहुत खूब...

    उत्तर देंहटाएं
  4. आज के सच को आइना दिखाती सुन्दर रचना ... सटीक ...

    उत्तर देंहटाएं

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