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मंगलवार, 20 जनवरी 2015

"दोहे-सरसों हुई उदास" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


कुहरा नभ पर देख कर, सहमा हुआ पलाश।
कैसे आयेगा भला, उपवन में मधुमास।
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धूप धरा पर है नहीं, ठिठुर रहा है गात।
आशाओं पर हो रहा, घना तुषारापात।।
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टेसू चिन्तित हो रहा, सरसों हुई उदास।
सरदी में कैसे उगे, जीवन में उल्लास।।
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सूर्य उत्तरायण हुआ, नहीं शीत का अन्त।
थरथर-थरथर काँपता, सिर पर खड़ा बसन्त।।
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जाते-जाते शीत तो, दिखा रही है रूप।
घर-आँगन में अभी भी, नहीं गुनगुनी धूप।।

6 टिप्‍पणियां:

  1. जाते-जाते शीत तो, दिखा रही है रूप।
    घर-आँगन में अभी भी, नहीं गुनगुनी धूप।।
    बहुत सुन्दर,एकदम सत्य.
    नई पोस्ट : मन का अनुराग

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर ...बस कुछ ही दिन की बात है ..फिर कुछ दिन गुनगुनी धूप और फिर गर्मी शुरू...

    उत्तर देंहटाएं

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