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शनिवार, 24 जनवरी 2015

"मौसम ने मधुमास सँवारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जल में-थल में, नीलगगन में,
 छाया है देखो उजियारा।
सबकी आँखों में सजता है,
रूप बसन्ती प्यारा-प्यारा।।

कलियाँ चहक रही उपवन में,
गलियाँ महक रही मधुबन में,
कल-कल, छल-छल करती धारा।
सबकी आँखों में सजता है,
रूप बसन्ती प्यारा-प्यारा।।

पंछी कलरव गान सुनाते,
तोते आपस में बतियाते,
दहका टेसू बन अंगारा।
सबकी आँखों में सजता है,
रूप बसन्ती प्यारा-प्यारा।।

सूरज जन-जीवन को ढोता,
चन्दा शीतल-शीतल होता,
दोनों हरते हैं अंधियारा।
सबकी आँखों में सजता है,
रूप बसन्ती प्यारा-प्यारा।।

भँवरे गुन-गुन करते आते,
कलियों फूलों पर मँडराते,
मौसम ने मधुमास सँवारा।
सबकी आँखों में सजता है,
रूप बसन्ती प्यारा-प्यारा।।

2 टिप्‍पणियां:

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