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गुरुवार, 22 जनवरी 2015

"छाया देने वाले छाते" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

 छाया देने वाले ही तो,
कहलाए जाते हैं छाते।।

धूप और बारिश से,
जो हमको हैं सदा बचाते।
छाया देने वाले ही तो,
कहलाए जाते हैं छाते।।
 
आसमान में जब घन छाते,
तब ये हाथों में हैं आते।
रंग-बिरंगे छाते ही तो,
हम बच्चों के मन को भाते।।
 तभी अचानक आसमान से,
मोटी-मोटी बूँदें आई।
प्रांजल ने उतार खूँटी से,
छतरी खोली और लगाई।।
 

प्राची ने जैसे ही देखा,
भइया छतरी ले आया है।
उसने भी प्यारा सा छाता,
अपने सिर पर फैलाया है।।
 
कई दिनों में वर्षा आई,
जाग गई मन में उमंग हैं।
भाई-बहन दोनों ही खुश हैं
छाते दो हैं भिन्न रंग हैं।।

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (23.01.2015) को "हम सब एक हैं" (चर्चा अंक-1867)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आखिरी दो लाईनों ने मायेनें दे दिये ......सुंदर
    भाई-बहन दोनों ही खुश हैं,
    छाते दो हैं भिन्न रंग हैं।।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुंदर बालगीत....बधाई..बहुत अच्‍छा लगता है ऐसी रचनाएं पढ़ कर।

    उत्तर देंहटाएं

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