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सोमवार, 26 जनवरी 2015

"दोहाष्टक-बुला रहा मधुमास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मास जनवरी जा रहा, मन है बहुत उदास।
फिर भी सबको प्यार से, बुला रहा मधुमास।१।
--
गेहूँ-सरसों फूलते, रहे सुगन्ध लुटाय।
मधुमक्खी-तितली-भ्रमर, खेतों में मँडराय।२।
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झड़बेरी पर छा गये, खट्टे-मीठे बेर।
करते हैं अठखेलियाँ, तीतर और बटेर।३।
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पतझड़ आया तो हुआ, नंगा-नंगा गात।
बसन्त अपने साथ में, लाया नूतन पात।४।
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मन को बहुत लुभा रहे, ये उपवन के फूल।
कितने प्यार-दुलार से, सुमन पालते शूल।५।
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गंगा जी में बह रहा, निर्मल-पावन नीर।
काँवड़ लेने जायेंगे, अब बहनों के बीर।६।
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जीवित माता-पिता की, करना सेवा आप।
मात-पिता को कभी भी, देना मत सन्ताप।७।
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दुनिया में सबसे बड़े, मात-पिता-आचार्य।
सबको जीवन के यही, सिखलाते हैं कार्य।८।

6 टिप्‍पणियां:

  1. वासंती रंग लिए सुंदर और सार्थक दोहे....मंगलकामनाएँ

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  2. आपकी कविता में तो वसंत का आनंद ले ही लिया। यहां तो शिशिर जाने का नाम नही ले रहा।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आदरणीय शुभ संध्या ...... पाराडाइज इंटर नेशनल स्कूल पटना की पत्रिका में आपकी इस रचना को छापने की अनुमति चाहिए थी मुझे .....

    उत्तर देंहटाएं
  4. विभा जी सादर वन्दे!
    मेरे नाम से आप यह रचना अपनी पाराडाइज इंटर नेशनल स्कूल पटना की पत्रिका में छाप दीजिए।
    आभार।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका ..... आपके नाम से ही आपकी रचना प्रकाशित होगी

      हटाएं

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