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गुरुवार, 12 मार्च 2015

"दोहे-खुलकर खिला पलाश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

स्वागत में नववर्ष के, खुलकर खिला पलाश।
नवसम्वत्सर लायेगा, जीवन में उल्लास।१।
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पावन होली खेलकर, चले गये हैं ढंग।
रंगों के त्यौहार के, अजब-ग़ज़ब थे रंग।२।
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जली होलिका आग में, बचा भक्त प्रहलाद।
जीवन में सबके रहे, प्यार भरा उन्माद।३।
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दहीबड़े-पापड़ सजे, खाया था मिष्ठान।
रंग-गुलाल लगा लिया, गाया होली गान।४।
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मिला हुआ था भाँग में, अदरख-तुलसीपत्र।
बौराये से लोग थे, यत्र-तत्र-सर्वत्र।५।
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देख खेत में धान्य को, हर्षित हुआ किसान।
होली में अर्पित किया, होलक का शुभदान।६।
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होली तो होली हुई, छोड़ गयी सन्देश।
भस्म बुराई हो गयी, बदल गया परिवेश।७।

2 टिप्‍पणियां:

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