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मंगलवार, 17 मार्च 2015

"छन्दशास्त्र-चौपाई लिखना सीखिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों।
  बहुत समय से चौपाई के विषय में कुछ लिखने की सोच रहा था! आज प्रस्तुत है मेरा यह छोटा सा आलेख।
    यहाँ यह स्पष्ट करना अपना चाहूँगा कि चौपाई को लिखने और जानने के लिए पहले छन्द के बारे में जानना बहुत आवश्यक है।
"छन्द काव्य को स्मरण योग्य बना देता है।"
     छन्द का सर्वप्रथम उल्लेख 'ऋग्वेदमें मिलता है। जिसका अर्थ है 'आह्लादित करना', 'खुश करना' 
अर्थात्- छन्द की परिभाषा होगी- 
    'वर्णों या मात्राओं के नियमित संख्या के विन्यास से यदि आह्लाद पैदा होतो उसे छन्द कहते हैं'
छन्द तीन प्रकार के माने जाते हैं।
‍     १- वर्णिक 
   २- मात्रिक और
‌   ३- मुक्त 
 मात्रा 
      वर्ण के उच्चारण में जो समय लगता है उसे मात्रा कहा जाता है। अ, , , ऋ के उच्चारण में लगने वाले समय की मात्रा ‍एक गिनी जाती है। आ, , , , , , औ तथा इसके संयुक्त व्यञ्जनों के   उच्चारण में जो समय लगता है उसकी दो मात्राएँ गिनी जाती हैं। व्यञ्जन स्वतः उच्चरित नहीं हो सकते हैं। अतः मात्रा गणना स्वरों के आधार पर की जाती है।
♥ वर्णों के भेद ♥
       मात्रा भेद से वर्ण दो प्रकार के होते हैं।

   १- हृस्व 

      ककिकुकृ 
      अँहँ (चन्द्र बिन्दु वाले वर्ण)
          (अँसुवर) (हँसी)
      त्य (संयुक्त व्यंजन वाले वर्ण)

   २- दीर्घ 

      काकीकूकेकैकोकौ
      इंविंतःधः (अनुस्वार व विसर्ग वाले वर्ण)
          (इन्दु) (बिन्दु) (अतः) (अधः)
      अग्र का अवक्र का व (संयुक्ताक्षर का पूर्ववर्ती वर्ण)
      राजन् का ज (हलन् वर्ण के पहले का वर्ण)
     हृस्व और दीर्घ को पिंगलशास्त्र में क्रमशः लघु और गुरू कहा       जाता है।
समान्यतया छन्द के अंग 
समान्यतया छन्द के अंग छः अंग माने गये हैंं
1.  चरण/ पद/ पाद
2.  वर्ण और मात्रा
3.  संख्या और क्रम
4.  गण
5.  गति
6.  यति/ विराम
चरण या पाद
  जैसा कि नाम से ही विदित हो रहा है चरण अर्थात् चार भाग वाला।
 दोहा, सोरठा आदि में चरण तो चार होते हैं लेकिन वे लिखे दो ही पंक्तियों में जाते हैं, और इसकी प्रत्येक पंक्ति को 'दल' कहते हैं।
 कुछ छंद छः- छः पंक्तियों (दलों) में लिखे जाते हैं, ऐसे छंद दो छंद के योग से बनते हैं, जैसे- कुण्डलिया (दोहा + रोला), छप्पय (रोला + उल्लाला) आदि।
 चरण 2 प्रकार के होते हैं- सम चरण और विषम चरण।
 प्रथम व तृतीय चरण को विषम चरण तथा द्वितीय व चतुर्थ चरण को सम चरण कहते हैं।
अब मूल बिन्दु पर वापिस आते हैं कि 
चौपाई क्या होती है?
चौपाई सम मात्रिक छन्द है जिसमें 16-16 मात्राएँ होती है।
   अब प्रश्न यह उठता है कि चौपाई के साथ-साथ “अरिल्ल” और “पद्धरि” में भी 16-16 ही मात्राएँ होती हैं फिर इनका नामकरण अलग से क्यों किया गया है?
     इसका उत्तर भी पिंगल शास्त्र ने दिया है- जिसके अनुसार आठ गण और लघु-गुरू ही यह भेद करते हैं कि छंद चौपाई हैअरिल् है या पद्धरि है।
  लेख अधिक लम्बा न हो जाए इसलिए “अरिल्ल” और “पद्धरि” के बारे में फिर कभी चर्चा करेंगे।
लेकिन गणों को थोड़ा जरूर देख लीजिए-
   गण आठ होते है-
यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, सगण
   गणों को याद रखने के लिए सूत्र-
यमाताराजभानसलगा
    इसमें पहले आठ वर्ण गणों के सूचक हैं और अन्तिम दो वर्ण लघु (ल) व गुरु (ग) के।
सूत्र से गण प्राप्त करने का तरीका-
   बोधक वर्ण से आरंभ कर आगे के दो वर्णों को ले लें। गण अपने-आप निकल आएगा।
उदाहरण- यगण किसे कहते हैं
यमाता
S S
अतः यगण का रूप हुआ-आदि लघु (S S)
   चौपाई में जगण और तगण का प्रयोग निषिद्ध माना गया है। साथ ही इसमें अन्त में गुरू वर्ण का ही प्रयोग अनिवार्यरूप से किया जाना चाहिए।
उदाहरण के लिए मेरी कुछ चौपाइयाँ देख लीजिए-
मधुवन में ऋतुराज समाया। 
पेड़ों पर नव पल्लव लाया।।
टेसू की फूली हैं डाली। 
पवन बही सुख देने वाली।।
--
सूरज फिर से है मुस्काया। 
कोयलिया ने गान सुनाया।।
आमनीमजामुन बौराए। 
भँवरे रस पीने को आए।।
--
भुवन भास्कर बहुत दुलारा।
मुख मंडल है प्यारा-प्यारा।।
सुबह-सवेरे जब जगते हो।
तुम कितने अच्छे लगते हो।।
--
श्याम-सलोनी निर्मल काया।
बहुत निराली प्रभु की माया।।
जब भी दर्श तुम्हारा पाते।
कली सुमन बनकर मुस्काते।।
--
कोकिल इसी लिए है गाता।
स्वर भरकर आवाज लगाता।।
जल्दी नीलगगन पर आओ।
जग को मोहक छवि दिखलाओ।।
--
इति!

10 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय के चरणों में नमन !

    छंद पर चर्चा कहीं भी हो मुझे रोक ही लेती है। आप द्वारा छंद पर की गई चर्चा न केवल सरल और संक्षिप्त है अपितु काव्य सम्बन्धी बारीकियों की जिज्ञासा रखने वाले छात्र स्वभावी व्यक्तियों के लिए अत्यंत उपयोगी भी है।

    "जब भी दर्श तुम्हारा पाते।
    कली सुमन बनकर मुस्काते।।"
    प्रश्न १ : उपर्युक्त पहली पंक्ति में 'मात्रा विन्यास कैसे किया जाए ?
    1. क्या ऐसे ----- II S II SSS SS
    2. या ऐसे --------- II S SI ISS SS
    3. या किसी अन्य प्रकार से ?

    प्रश्न २ : नियमानुसार चौपाई में जगण और तगण का प्रयोग निषिद्ध माना गया है।
    क्या चौपाई के आरम्भ में या कहीं भी? स्पष्ट नहीं किया गया है। इस कारण उन उन जगह पर दृष्टि पहुँच रही है जहाँ जगण और तगण उपस्थित हैं। कृपया नियम की मर्यादा और उसका प्रभावक्षेत्र स्पष्ट करें।

    प्रश्न ३ : इस बात पर चिंतन करने लगा हूँ कि छंदशास्त्र में निषिद्धताओं के नियम क्यों बने होंगे। क्या आप इस ओर प्रकाश डाल सकेंगे। मैं अभी तक केवल 'मुखसुख' को उत्तरदायी ठहरा पा रहा हूँ।

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  2. अरिल्ल और पद्धरि छंद के बारे में आगामी आलेखों की प्रतीक्षा रहेगी। जिज्ञासा बलवती है। :)

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  3. बहुत अच्छी जानकारी के लिए आभार.

    उत्तर देंहटाएं

  4. शिक्षण सम्बन्धी बढ़िया आलेख।

    उत्तर देंहटाएं

  5. शिक्षण सम्बन्धी बढ़िया आलेख।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आभार सर!
    मैंने आज ही आप से प्रश्न किया कि छंदों की पहचान कैसे हो....और आपने मेरी जिज्ञासा शांत की...बहुत-बहुत आभार।
    ज्ञानवर्धक पोस्ट है......काव्य साधकों के लिए किसी उपहार जैसा।

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  7. आज 18/मार्च/2015 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  8. ज्ञानवर्धक और उपयोगी पोस्ट...सुंदर और सरल प्रस्तुति के लिए आभार

    उत्तर देंहटाएं
  9. आदरणीय , इस ज्ञान का अमृत निरन्तर प्राप्त होता रहा । मैं सीखना चाहती हूँ । मार्ग दर्शन मिलता रहे ।

    उत्तर देंहटाएं

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