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रविवार, 8 मार्च 2015

"अन्तरराष्ट्रीय नारि-दिवस पर दो व्यंग्य रचनाएँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Happy International Women's Day!
अन्तरराष्ट्रीय नारी दिवस पर दो व्यंग्य रचनाएँ
(१)
"काश् मैं नारि होता!"
काश् मैं नारि होता!
आभासी दुनिया में
ब्लॉग पर
अपना सुन्दर चित्र लगाता
चार लाइन लिखता
और चालीस कमेंट पाता!
काश् मैं नारि होता!
--
अपनी प्रोफाइल में
विदेश का पता भरता
दुनियाभर के लोगों से
मनोरंजक बातें करता
व्यंग्य में कही बात को भी
अपनी प्रसंशा ही जानता
और खुद को बहुत ही
सौभाग्यशाली मानता
काश् मैं नारि होता!
--
पति रात-दिन की
ड्यूटी कर धन कमाता
घर आकर
खुद भोजन बनाता
या होटल से लाता
मैं ठाठ से खाता
और हुक्म चलाता
काश् मैं नारि होता!
(२)
अच्छा ही हुआ! जो मैं नारि न हुआ!
 
मुझको पुरुष बना कर प्रभु ने,
बहुत बड़ा उपकार किया है।
नर का चोला देकर भगवन,
अनुपम सा उपहार दिया है।
--
नारी रूप अगर देते तो,
अग्नि परीक्षा देनी होती।
बार-बार जातक जनने की,
कठिन वेदना सहनी होती।।
--
चूल्हे-चौके में प्रतिदिन ही,
खाना मुझे बनाना होता।
सबको देकर भोजन-पानी,
मुझे अन्त में खाना होता।।
--
सास-ससुर, और जेठ-ननद की,
झिड़की सुन चुप रहना होता।
केवल दो आँसू टपकाकर,
मन ही मन सब सहना होता।।
--
नारी बनकर तो जीवन की
छिन ही जाती सब आजादी।
इधर-उधर आने-जाने में,
बाधाएँ आड़े आ जाती।।
--
फिर कैसे उन्मुक्तभाव से,
मीठी-मीठी बातें कहते।
कदम-कदम पर पहरे होते,
हरदम सहमे-सहमे रहते।।
--
अपने मन की टीवी-सीडी
और सीरियल देख न पाते।
समाचार उनकी मर्जी के,
देख-देख मन में झुँझलाते।।
--
दाढ़ी-मूछ उगाकर मुख पर,
मर्दाना शृंगार दिया है।।
नर का चोला देकर भगवन,
अनुपम सा उपहार दिया है।

4 टिप्‍पणियां:

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