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शनिवार, 21 मार्च 2015

"दोहे-सम्वत्सर तो चमन में लाता हर्ष विशेष" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नवसम्वत्सर आ गया, गया पुराना साल।
नूतन आशाएँ जगीं, सुधरेंगे अब हाल।।
--
ओ भारत के वासियों, मन को करो उदार।
केवल हिन्दु वर्ष क्यों, इसको रहे पुकार।।
--
पंथ भिन्न तो क्या हुआ, सबका है ये देश।
सम्वत्सर तो चमन में, लाता हर्ष विशेष।।
--
नौ दिन के ही लिए क्यों, करते पूजा-जाप।
प्रतिदिन पूजा-पाठ से, कटते संकट-ताप।।
--
माँ जगदम्बा का करो, सच्चे मन से ध्यान।
माँ शक्ति का रूप है, माता बहुत महान।।
--
माता से अस्तित्व है, सन्तानों का आज।
माता की पूजा से बनें, सबके बिगड़े काज।।
--
धरती में-आकाश में, देवताओं का वास।
कभी न करना चाहिए, देवों का उपहास।।
--
कुदरत की अठखेलियाँ, करती बहुत उदास।
आशा है नववर्ष फिर, लायेगा उल्लास।।

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर रचना.
    नव वर्ष की शुभकामनाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    आपको भी नवसम्वत्सर की हार्दिक मंगलकामनाएं!

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर दोहे . नववर्ष की शुभकामनाएँ

    उत्तर देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. आज 22/मार्च/2015 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं

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