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सोमवार, 2 मार्च 2015

"दोहे-फीका रंग-गुलाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

होली में इस साल है, फीका रंग-गुलाल।
बारिश के कारण हुआ, जीवन तो बदहाल।१।
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सावन सा फागुन लगे, बरस रहा है मेह।
कहने को मधुमास है, मगर नहीं है नेह।२।
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बर्फ पहाड़ों पर पड़ी, मैदानों में नीर।
फिर से सर्दी आ गयी, शीतल हुआ समीर।३।
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होली में करते सभी, अपने रीत-रिवाज।
चिप्स और पापड़ भला, कैसे सूखें आज।४।
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मोदी जी के बजट ने, उड़ा दिये हैं होश।
सिर्फ अबीर-गुलाल से, कर लेना सन्तोष।५।
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सबके मन को भा गये, भाषण लच्छेदार।
सत्ता हथिया कर मगर, बदल गया किरदार।६।
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मँहगाई की मार से, बिगड़ गये हैं ढंग।
खुश होकर कैसे भला, खेले जनता रंग।७। 

4 टिप्‍पणियां:

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