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रविवार, 22 मार्च 2015

"ग़ज़लनुमा कुछ अशआर-हसरत रही बकाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


हमने वफा का नाता, ताउम्र है निभाया
लेकिन कदम मिलाकर, तुमको न चलना आया

मरहम लगाने वाले, मिलते कदम-कदम पर
फिर भी हमारे दिल को, आराम कुछ न आया

दिल के लहू से लिखकर, कितने पयाम भेजे
लेकिन जवाब उसका, अब तक न कोई आया

राह तकते-तकते, अब चश्म थक गयी हैं
था इन्तज़ार जिसका, वो आज तक न आया

“रूप” की सुहानी, अब धूप ढल चुकी है
दम तोड़ते लम्हों में, हसरत रही बकाया

7 टिप्‍पणियां:

  1. मरहम लगाने वाले, मिलते कदम-कदम पर
    फिर भी हमारे दिल को, आराम कुछ न आया
    बहुत खूब ... आज के दौर में झूठी मरहम जो लगाते हैं लोग ... सच्चा कौन मिलता है ...
    लाजवाब हैं सभी शेर ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. क्या खूबसूरत ग़ज़ल है! मजा आ गया पढ़कर।बहुत खूब !

    उत्तर देंहटाएं
  3. क्या खूबसूरत ग़ज़ल है! मजा आ गया पढ़कर।बहुत खूब !

    उत्तर देंहटाएं

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