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सोमवार, 30 मार्च 2015

"क्या कानून बदला नही जा सकता?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

        आज सारी दुनिया भारत को सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश के रूप मे जानती है। परन्तु इस लोकतन्त्र का घिनौना चेहरा अब लोगों के सामने आ चुका है।
       क्या आपने किसी निर्धन और ईमानदार व्यक्ति तो चुनाव लड़ते हुए देखा है?
       वह तो केवल मत देने के लिए ही पैदा हुआ है। यदि कोई ईमानदार और गरीब आदमी भूले भटके ही सही चुनाव में खड़ा हो जाता है, तो क्या वह चुनाव जीत कर संसद के गलियारों तक पहुँचा है।
        इसका उत्तर बस एक ही है ‘नही’ ।
       आज केवल धनाढ्य व्यक्ति ही चुनाव लड़ सकता है। बस यही सत्य है । नेताओं के पुत्र-पुत्रियाँ, फिल्मी अभिनेता, या बे-ईमान और काला-धन कमाने वाले ही चुनावी समर में दिखाई देते हैं। इसीलिए संसद का चेहरा नित्य प्रति बिगड़ता जा रहा है।
     लोकतन्त्र, लोकतन्त्र कम और राजतन्त्र या भ्रष्टतन्त्र अधिक दिखाई देता है।
       क्या यह कानून बदला नही जा सकता?
     सम्भव तो हैं पर इसे बदलेगा कौन? राजतन्त्र की तरह नेताओं कुर्सी नशीन के पुत्र या भ्रष्ट नेतागण। सारी आशायें दम तोड़ती नजर आती हैं। दूध की रखवाली बिल्लों के हाथ में हो तो ये झूठी आशायें पालना ही बेकार है। 
     आज चारों ओर से आवाज उठ रही हैं कि 100 प्रतिशत मतदान करो। लेकिन ये मत तो राजनेताओं, उनके वंशजों तथा भ्रष्टाचारियों को ही तो जायेंगे।
     कहने को तो चुनाव आयोग बड़े-बड़े अंकुश लगाने के बड़े-बड़े दावे करता है। परन्तु धनाढ्यों को मनमाना धन खर्च करने की छूट मिली हुई है।
      चुनाव आयोग को चाहिए कि वह हर एक प्रत्याशी से एक निश्चित धन-राशि जमा करा कर, चुनाव प्रचार की कमान अपने हाथ में ले। व्यक्तिगत रूप से न कोई झण्डा न बैनर न पोस्टर न अपील का नियम चुनाव आयोग लागू करे।
        आखिर चुनाव कराना सरकार का काम है। अतः इस गूँगे-बहरे, लुंज-पुंज लोकतन्त्र को पुनः सच्चे लोकतन्त्र के रूप में स्थापित के लिए प्रयास सरकार को ही करने चाहियें। सबका समान प्रचार कराने की जिम्मेदारी सरकार को निभानी चाहिए। प्रत्याशी का काम बस नामांकन तक ही सीमित होना चाहिए।
        तभी सच्चा लोकतन्त्र इस देश में प्रतिस्थापित हो सकता है।

7 टिप्‍पणियां:

  1. इतना कौन कहाँ सोचता है ... सरकार को बस अपने बन्दों और वोटबेंक की लगी होती है ... इसके आगे नहीं ...

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  2. लोक है ही कहाँ भोग हो गया है तंत्र :)

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    औरों से पहले खुद पे ऐतबार कीजिये
    जो बात कहने की हो उसे कह ही दीजिये
    रोने गिड़गिड़ाने से कोई फायदा नहीं दोस्त!
    दो हाथ है बढाइये हक़ छीन लीजिये।
    लोकतंत्र यही प्रासंगिक है।

    उत्तर देंहटाएं
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