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रविवार, 29 मार्च 2015

"गीत-देवभूमि अपना भारत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
जब बसन्त का मौसम आता,
गीत प्रणय के गाता उपवन।
मधुमक्खी-तितली-भँवरे भी,
खुश हो करके करते गुंजन।।

पेड़ और पौधें भी फिर से,
नवपल्लव पा जाते हैं,
रंग-बिरंगे सुमन चमन में,
हर्षित हो मुस्काते हैं,
नयी फसल से भर जाते हैं,
गाँवों में सबके आँगन।
मधुमक्खी-तितली-भँवरे भी,
खुश हो करके करते गुंजन।।

आत है जब नवसम्वतसर,
मन में चाह जगाता है,
जीवन में आगे बढ़ने की,
नूतन राह दिखाता है,
होली पर अच्छे लगते हैं,
सबको नये-नये व्यंजन।
मधुमक्खी-तितली-भँवरे भी,
खुश हो करके करते गुंजन।।

माता का वन्दन करने को,
आते हैं नवरात्र सुहाने,
तन-मन का शोधन करने को,
गाते भक्तिगीत तराने,
राम जन्म लेते नवमी पर
दुःख दूर करते रघुनन्दन।
मधुमक्खी-तितली-भँवरे भी,
खुश हो करके करते गुंजन।।

हर्ष मनाते बैशाखी पर,
अन्न घरों में आ जाता है,
कोयल गाती पंचम सुर में,
आम-नीम बौराता है,
नीर सुराही का पी करके,
मन हो जाता है चन्दन।
मधुमक्खी-तितली-भँवरे भी,
खुश हो करके करते गुंजन।।

देवभूमि अपना भारत है,
आते हैं अवतार यहाँ,
षड्ऋतुओं का होता संगम,
दुनियाँ में है और कहाँ,
भारत की पावन माटी को,
करता हूँ शत्-शत् वन्दन।
मधुमक्खी-तितली-भँवरे भी,
खुश हो करके करते गुंजन।। 

8 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर गीत ... भारत देश की तमाम ऋतुओं का वर्णन काव्यात्मक रूप से बाखूबी लिखा है ...
    प्रणाम शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. भावनाओं सुन्दर अविरल प्रवाह

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह .... अनुपम भाव संयोजन

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर देशप्रेम के रंग में रंगा नवगीत...
    जय भारत!

    उत्तर देंहटाएं
  5. नीर सुराही का पी करके,
    मन हो जाता है चन्दन।

    बहुत ही सुंदर पंक्तियां. मन को शब्दों से ठंडक पहुंचाते शब्द हैं आपकी इस सुंदर रचना में.

    उत्तर देंहटाएं
  6. भारत की पावन माटी को,
    करता हूँ शत्-शत् वन्दन।

    मनभावन नवगीत!

    उत्तर देंहटाएं

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