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रविवार, 15 मार्च 2015

"बालगीत-मिलने आना तुम बाबा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


पापा की लग गई नौकरी,
देहरादून नगर बाबा।
कैसे भूलें प्यार आपका,
नहीं सूझता कुछ बाबा।।

छोटा घर है, नया नगर है,
सर्द हवा चलती सर-सर है,
बन जायेंगे नये दोस्त भी,
अभी अकेले हैं बाबा।

प्यारे चाचा-दादी जी की,
हमको याद सताती है,
विद्यालय की पीली बस भी,
गलियों में नहीं आती है,
भीड़ बहुत है इस नगरी में,
मँहगाई भी है बाबा।

आप हमारे लिए रोज ही,
रचनाएँ रच देते हो,
बच्चों के मन की बातों को,
सहज भाव से कहते हो,
ब्लॉग आपका बिना नेट के,
कैसे हम देखें बाबा।

छोटी बहना प्राची को तो,
बाबा-दादी प्यारी थी,
छोटी होने के कारण वो,
सबकी बहुत दुलारी थी।
बहुत अकेली सहमी सी है,
गुड़िया रानी जी बाबा।
गर्मी की छुट्टी होते ही,
अपने घर हम आयेंगे,
जो भी लिखा आपने बाबा,
पढ़कर वो हम गायेंगे,
जब भी हो अवकाश आपको,
मिलने आना तुम बाबा।

6 टिप्‍पणियां:

  1. मन को छूते हुए भाव ले कर बुना सुन्दर बाल गीत ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. आज 16/मार्च/2015 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  3. गर्मी की छुट्टी होते ही,
    अपने घर हम आयेंगे,
    जो भी लिखा आपने बाबा,
    पढ़कर वो हम गायेंगे,
    जब भी हो अवकाश आपको,
    मिलने आना तुम बाबा।
    ..सुन्दर बाल मनुहार गीत ..
    ..अपना घर अपना ही होता है ..दूसरी जगह अपना होने में बहुत वक़्त लगता है फिर भी कसक मन में बनी रहती हैं ...

    उत्तर देंहटाएं

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