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रविवार, 1 मार्च 2020

"मेरी तीन पुरानी रचनाएँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रुद्रपुर (ऊधमसिंहनगर) में देशज सर्वोदय सांस्कृतिक समिति द्वारा आयोजित देशी मेला एवं होली महोत्सव में आयोजित कवि सम्मेलन में मेरा काव्य पाठ।
मित्रों!

आज प्रस्तुत हैं मेरी तीन पुरानी रचनाएँ

--

(1)
फूलों की मुझको चाह नहीं,
मैं काँटों को स्वीकार करूँ।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

सागर पर जिनने पुल बाँधा,
नल-नील भले ही खो जाये।
मैं सिन्धु सुखाने वाले,
कुम्भज का आदर मनुहार करूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

अम्बर चाहे मत लौटा हमको,
महावीर, गौतम, गाँधी।
दे दे प्रताप. इन्दिरा, सुभाष,
मैं गोविन्दसिंह से प्यार करूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

अब नहीं चाहिए पांचाली,
खिँच गया चीर दुर्गा न बनी।
लक्ष्मीबाई को लौटा दे,
फिर अरिमुण्डों से हार भरूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

ले नूरजहाँ लाखों चाहे,
बस एक पद्मिनी ही दे दे।
चन्दन-अबीर समझूँ गुलाल,
माथे पर उसकी क्षार धरूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

काबा-काशी या यरूशलम,
बद्रीनारायण छोटे हैं।
हैं कुरूक्षेत्र-हल्दीघाटी,
इम्फाल तीर्थ सत्कार करू।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

दे शूल जो बाणों पर चढ़कर,
नाचें सदैव गाण्डीवों पर।
जो जूड़ों पर चढ़ मुरझाते,
उन फूलों से क्या प्यार करूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

मोहन! बंशी की चाह नहीं,
दो देवदत्त या पाञ्चजन्य।
चरखा लो, चक्र सुदर्शन दो,
मैं प्रलयंकर गुंजार करूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

अब नहीं चाहिए चरण कमल,
दे दे अंगद का एक पाँव।
भू डोल उठे, अरि वक्षस पर,
मैं ऐसा वज्र प्रहार करूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

माँ सरस्वती वीणा रख कर,
धारण त्रिशूल कर दुर्गा बन।
तेरे चरणों में शीश झुका,
मैं अभिनन्दन शत बार करूँ।।
फूलों की मुझको चाह नहीं,
मैं काँटों को स्वीकार करूँ।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।
(2)
इन्साफ की डगर परनेता नही चलेंगे।
होगा जहाँ मुनाफाउस ओर जा मिलेंगे।।
दिल में घुसा हुआ है,
दल-दल दलों का जमघट।
संसद में फिल्म जैसा,
होता है खूब झंझट।
फिर रात-रात भर मेंआपस में गुल खिलेंगे।
होगा जहाँ मुनाफा उस ओर जा मिलेंगे।।
गुस्सा व प्यार इनका,
केवल दिखावटी है।
और देश-प्रेम इनका,
बिल्कुल बनावटी है।
बदमाशमाफिया सब इनके ही घर पलेंगे।
होगा जहाँ मुनाफाउस ओर जा मिलेंगे।।
खादी की केंचुली में,
रिश्वत भरा हुआ मन।
देंगे वहीं मदद ये,
होगा जहाँ कमीशन।
दिन-रात कोठियों मेंघी के दिये जलेंगे।
होगा जहाँ मुनाफाउस ओर जा मिलेंगे।।

(3)
कितने अच्छे लग रहे, होली के ये रंग।
रंगों के त्यौहार में, नहीं मिलाना भंग।।
रंगों का अब आ रहा, मनभावन त्यौहार।
रूठे सुजन मनाइए, करके यत्न हजार।।

होली के त्यौहार में, बाँटो सबको प्यार।
रंगों की बौछार से, निर्मल करो विकार।।

बच्चों-बूढ़ों के लिए, रहना सदा उदार।
रंग-अबीर-गुलाल है, होली का उपहार।।

हँसी-ठिठोली को करो, मर्यादा के संग।
जो लगवाये प्यार से, उसे लगाओ रंग।।

देख खेत में अन्न को, होता हर्ष अपार।
इसीलिए मधुमास में, आता ये त्यौहार।।

6 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (02-03-2020) को 'सजा कैसा बाज़ार है?' (चर्चाअंक-3628) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    *****
    रवीन्द्र सिंह यादव

    जवाब देंहटाएं
  2. अत्यंत प्रभावशाली रचनाएँ हैं। सादर प्रणाम।

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत ही लाजवाब रचनाएं
    वाह!!!

    जवाब देंहटाएं

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