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बुधवार, 18 मार्च 2020

साहित्य सुधा में प्रकाशित "गीत का व्याकरण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 81, मार्च(द्वितीय), 2020
सीखिए गीत से, गीत का व्याकरण
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
हार में है छिपा जीत का आचरण। सीखिए गीत से, गीत का व्याकरण।। बात कहने से पहले विचारो जरा धूल दर्पण की ढंग से उतारो जरा तन सँवारो जरा, मन निखारो जरा आइने में स्वयं को निहारो जरा दर्प का सब हटा दीजिए आवरण। सीखिए गीत से, गीत का व्याकरण।। मत समझना सरल, ज़िन्दग़ी की डगर अज़नबी लोग हैं, अज़नबी है नगर ताल में जोहते बाट मोटे मगर मीत ही मीत के पर रहा है कतर सावधानी से आगे बढ़ाना चरण। सीखिए गीत से, गीत का व्याकरण।। मनके मनकों से होती है माला बड़ी तोड़ना मत कभी मोतियों की लड़ी रोज़ आती नहीं है मिलन की घड़ी तोड़ने में लगी आज दुनिया कड़ी रिश्ते-नातों का मुश्किल है पोषण-भरण। सीखिए गीत से, गीत का व्याकरण।। वक्त की मार से तार टूटे नहीं भीड़ में मीत का हाथ छूटे नहीं खीर का अब भरा पात्र फूटे नहीं लाज लम्पट यहाँ कोई लूटे नहीं प्यार से प्यार का कीजिए जागरण सीखिए गीत से, गीत का व्याकरण।।

4 टिप्‍पणियां:

  1. मनके मनकों से होती है माला बड़ी
    तोड़ना मत कभी मोतियों की लड़ी
    अति सुन्दर सृजन ।

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 19.3.2020 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3645 में दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।

    धन्यवाद

    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं

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