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मंगलवार, 31 मार्च 2020

संस्मरण "भूख" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

संस्मरण
(भूख)
 लगभग 45 साल पुरानी घटना है। उन दिनों नेपाल में मेरा हम-वतन प्रीतम लाल पहाड़ में खच्चर लादने का काम करता था। इनका परिवार भी इनके साथ ही पहाड़ में किराये के झाले (लकड़ी के तख्तों से बना घर) में रहता था।
     कुछ दिनों के बाद इनका अपने घर नजीबाबाद के पास के गाँव पुरुषोत्तमपुर जाने का कार्यक्रम था। रास्ते में बनबसा मेरा मकान होने के कारण मिलने के लिए आये।
       औपचारिकतावश् चाय नाश्ता बनाया गया। प्रीतम की लड़की चाय बना कर लाई। परन्तु उसने चाय को बना कर छाना ही नही।  
      पहले सभी को निथार कर चाय परोसी गई। नीचे बची चाय को उसने अपने छोटे भाई बहनों के कपों में उडेल दिया।
     सभी लोग चाय पीने लगे।
     लेकिन प्रीतम के बच्चों ने चाय पीने के बाद चाय पत्ती को भी मजा लेकर खाया।
      ये लोग अब बस से जाने की तैयारी में थे कि प्रीतम ने मुझसे कहा कि डॉ. साहब कल से भूखे हैं। हमें 2-2 रोटी तो खिला ही दो।
    मैंने कहा- ‘‘जरूर।’’
     श्रीमती ने पराँठे बनाने शुरू किये तो मैंने कहा कि इनके लिए रास्ते के लिए भी पराँठे रख देना।
     अब प्रीतम और उसके परिवार ने पराँठे खाने शुरू किये। वो सब इतने भूखे थे कि पेट जल्दी भरने के चक्कर में दो पराँठे एक साथ हाथ में लेकर डबल-टुकड़े तोड़-तोड़ कर खाने लगे।
     उस दिन मैंने देखा कि भूख और निर्धनता क्या होती है।

5 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय शास्त्री जी, भूख का रूप तो इससे भी ज्यादा विभत्स हैं। मैं ने इसे अनुभव किया हैं। भूखे इंसान को कोई वर मांगने कहेगा तो उसे सोने चांदी और हीरे जवाहरात याद नहीं आएंगे। उसे याद आएगी तो बस रोटी। एक भूखे इंसान से किसी ने पूछा, चाँद कैसा दिखता हैं तो उसका जबाब था गोल गोल रोटी जैसा।

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  2. भूख की आग वही समझ सकता जो कभी इसे भोगा होगा ,मार्मिक संस्मरण ,सादर नमन सर

    जवाब देंहटाएं
  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (03-04-2020) को "नेह का आह्वान फिर-फिर!"
    (चर्चा अंक 3660)
    पर भी होगी।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।

    आप भी सादर आमंत्रित है

    जवाब देंहटाएं

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