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सोमवार, 16 मार्च 2020

दोहे "घोड़ों से भी कीमती, गधे हो गये आज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


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मौसम है बदला हुआ, बदले रीति-रिवाज।
घोड़ों से भी कीमती, गधे हो गये आज।।
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बनी हुई सम्भावना, नियमित नित्य अनन्त।
बिकते ऊँचे दाम में, राजनीति के सन्त।।
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जनसेवा के नाम पर, करते ओछे काम।
इसीलिए तो हो रहा, लोकतन्त्र बदनाम।।
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बाहर बने कपोत से, भीतर से हैं काग।
महज दिखावे के लिए, सुना रहे हैं राग।।
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सत्ता-सरिता में बढ़ी, शैतानों की बाढ़।
चौमासे सा बरसता, गरमी में आषाढ़।।
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आज दम्भ में चूर हैं, पीकर गाँजा-भाँग।
खींच रहे हैं नशे में, सत्ता की सब टाँग।।
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केंचुलियों में ढक लिए, नेताओं ने दाग।
लोकतन्त्र को डस रहे, आदम बनकर नाग।।
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थामी सबने हाथ में, छल-बल की पतवार।
आपाधापी में चले, सागर करने पार।।
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ओढ़ लबादा बाघ का, शेर बन गये स्यार।
लहराते हैं हवा में, सब अपने हथियार।।
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6 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (17 -3-2020 ) को मन,मानव और मानवता (चर्चा अंक 3643) पर भी होगी,

    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ---
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  3. ऐसे ही स्वार्थी, नामुराद, निकज्जो से भरी-पटी है राजनितिक गलियारे!
    बहुत सही!

    जवाब देंहटाएं
  4. गहरा व्यंग्य

    मेरी आज की ग़ज़ल भी हमारे प्रदेश की राजनीतिक घटनाओं पर केंद्रित है।

    जवाब देंहटाएं

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