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बुधवार, 26 दिसंबर 2012

"कैसे नूतन सृजन करूँ मैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सबकुछ वही पुराना सा है!
कैसे नूतन सृजन करूँ मैं?

कभी चाँदनी-कभी अँधेरा,
लगा रहे सब अपना फेरा,
जग झंझावातों का डेरा,
असुरों ने मन्दिर को घेरा,
देवालय में भीतर जाकर,
कैसे अपना भजन करूँ मैं?
कैसे नूतन सृजन करूँ मैं?

वो ही राग-वही है गाना,
लाऊँ कहाँ से नया तराना,
पथ तो है जाना-पहचाना,
लेकिन है खुदगर्ज़ ज़माना,
घी-सामग्री-समिधा के बिन,
कैसे नियमित यजन करूँ मैं?
कैसे नूतन सृजन करूँ मैं?

बना छलावा पूजन-वन्दन
मात्र दिखावा है अभिनन्दन
चारों ओर मचा है क्रन्दन,
बिखर रहे सामाजिक बन्धन,
परिजन ही करते अपमानित,
कैसे उनको सुजन करूँ मैं?

गुलशन में पादप लड़ते हैं,
कमल सरोवर में सड़ते हैं,
कदम नहीं आगे बढ़ते हैं,
पावों में कण्टक गड़ते है,
पतझड़ की मारी बगिया में,
कैसे मन को सुमन करूँ मैं?
कैसे नूतन सृजन करूँ मैं?

17 टिप्‍पणियां:

  1. सर्वत्र वही प्रागाभिहित रूप है..,
    केसे नूतन सृजन करूँ मैं..,

    घृत हविर गृह दान के हीन..,
    कैसे नव हुति यजन करूँ मैं.....

    उत्तर देंहटाएं
  2. शानदार लेखन,
    जारी रहिये,
    बधाई !!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. बना छलावा पूजन-वन्दन
    मात्र दिखावा है अभिनन्दन
    चारों ओर मचा है क्रन्दन,
    बिखर रहे सामाजिक बन्धन,
    परिजन ही करते अपमानित,
    कैसे उनको सुजन करूँ मैं?

    शानदार प्रस्तुति !!

    उत्तर देंहटाएं
  4. अब सृजन से ही कुछ होगा। कवि अपना धर्म भूल गए इसलिए ही ऐसा हो रहा है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. गुलशन में पादप लड़ते हैं,
    कमल सरोवर में सड़ते हैं,
    कदम नहीं आगे बढ़ते हैं,
    पावों में कण्टक गड़ते है,
    पतझड़ की मारी बगिया में,
    कैसे मन को सुमन करूँ मैं?
    कैसे नूतन सृजन करूँ मैं?
    गहन भाव लिये सार्थक अभिव्‍यक्ति

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुट 'वेदना' है कविता में,इस में मन की पीड़ा |

    उत्तर देंहटाएं
  7. शानदार प्रस्तुति ओर सार्थक अभिव्‍यक्त गुलशन में पादप लड़ते हैं,
    कमल सरोवर में सड़ते हैं,
    कदम नहीं आगे बढ़ते हैं,
    पावों में कण्टक गड़ते है,
    पतझड़ की मारी बगिया में,
    कैसे मन को सुमन करूँ मैं?
    कैसे नूतन सृजन करूँ मैं?

    उत्तर देंहटाएं
  8. बेहतरीन रचना...
    अति उत्तम...
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  9. बिखर रहे सामाजिक बन्धन,
    परिजन ही करते अपमानित,
    कैसे उनको सुजन करूँ मैं?

    bahut hi sundar rachana badhai sir .

    उत्तर देंहटाएं
  10. सृजन बेल नित बढ़ती जाती,
    कविता मन के भाव जताती।

    उत्तर देंहटाएं

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