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रविवार, 30 दिसंबर 2012

"मुखौटे राम के" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



मुखौटे राम के पहने हुए, रावण जमाने में। 
लुटेरे ओढ़ पीताम्बर, लगे खाने-कमाने में।।

दया के द्वार पर, बैठे हुए हैं लोभ के पहरे, 
मिटी सम्वेदना सारी, मनुज के स्रोत है बहरे, 
सियासत के भिखारी व्यस्त हैं कुर्सी बचाने में। 
लुटेरे ओढ़ पीताम्बर लगे खाने-कमाने में।।

जो सदियों से नही सी पाये, अपने चाकदामन को, 
छुरा ले चल पड़े हैं हाथ वो, अब काटने तन को, 
वो रहते भव्य भवनों में, कभी थे जो विराने में। 
लुटेरे ओढ़ पीताम्बर लगे खाने-कमाने में।।

युवक मजबूर होकर खींचते हैं रात-दिन रिक्शा, 
मगर कुत्ते और बिल्ले कर रहें हैं दूध की रक्षा, 
श्रमिक का हो रहा शोषण, धनिक के कारखाने में। 
लुटेरे ओढ़ पीताम्बर लगे खाने-कमाने में।।

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर सम-सामायिक रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  2. सार्थक ,बहुत सुंदर रचना.
    मुखौटे राम के पहने हुए, रावण जमाने में।
    लुटेरे ओढ़ पीताम्बर, लगे खाने-कमाने में।।

    दया के द्वार पर, बैठे हुए हैं लोभ के पहरे,
    मिटी सम्वेदना सारी, मनुज के स्रोत है बहरे,
    सियासत के भिखारी व्यस्त हैं कुर्सी बचाने में।
    लुटेरे ओढ़ पीताम्बर लगे खाने-कमाने में।।

    उत्तर देंहटाएं

  3. "मुखौटे राम के पहने हुए, रावण जमाने में।
    लुटेरे ओढ़ पीताम्बर, लगे खाने-कमाने में…"
    -सटीक व सुन्दर रचना.....
    ---हाँ..पर प्रश्न है...
    ---सही है बात ये सारी, मगर इतना बता ऐ दोस्त! ,
    कि क्यों एसा हुआ है प्रगति के भी इस जमाने में |

    उत्तर देंहटाएं
  4. सत्ता के गलियारे में सब रावन ही है.सार्थक अभिवयक्ति
    मुखौटे राम के पहने हुए, रावण जमाने में।
    लुटेरे ओढ़ पीताम्बर, लगे खाने-कमाने में।।

    उत्तर देंहटाएं

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