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बुधवार, 19 दिसंबर 2012

"काम अपना तमाम करते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सुबह करते हैं, शाम करते हैं 
हर खुशी तेरे नाम करते हैं 

ओढ़ करके ग़मों की चादर को
काम अपना तमाम करते हैं

जब भी दैरो-हरम में जाते हैं
हम तिरा एहतराम करते हैं 

देख करके जईफ लोगों को 
हम अदब से सलाम करते हैं 

ज़िन्द्ग़ी चार दिन का खेला है 
किसलिए कत्लो-आम करते हैं

आशिकों की यही हक़ीक़त है
"रूप" उनको गुलाम करते हैं 

7 टिप्‍पणियां:

  1. आशिक़ों की हक़ीक़त पर सुन्दर और सटीक बयान।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सरजी बेहतरीन गजल है हरअशआर बोलता है :देख करके जईफ लोगों को
    हम अदब से सलाम करते हैं

    ज़िन्द्ग़ी चार दिन का खेला है
    किसलिए कत्लो-आम करते हैं

    उत्तर देंहटाएं
  3. ज़िन्द्ग़ी चार दिन का खेला है
    किसलिए कत्लो-आम करते हैं

    ..बहुत खूब...लाज़वाब ग़ज़ल..

    उत्तर देंहटाएं
  4. 'काम अपना तमाम करते हैं' मुहावरे का 'श्लेशात्म्क़ प्रयोग'!

    उत्तर देंहटाएं
  5. ..बहुत खूब...लाज़वाब ग़ज़ल..

    उत्तर देंहटाएं

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