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शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

"वो पात-पात निकले" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

ये डाल-डाल निकले. वो पात-पात निकले।
पाने को मत हमारे, वो साथ-साथ निकले।

परदेशियों के आगे, घुटने वो टेकते हैं,
ये देश से दलाली, करने की बात निकले।

निर्धन का जो अभी तक, दामन भी सिल न पाये, 
हथियाने को वतन का, वो स्वर्णथाल निकले।

वो फसल काटने को, गैरों को ला रहे हैं,
सपने हसीं दिखाकर, खाने को माल निकले।

वोटों के ये भिखारी, मक्कार हो गये हैं,
अपनों के वास्ते ही, बुनने को जाल निकले।

है नाम भी मुलायम और "रूप" भी मुलायम,
माया को साथ लेकर, करने हलाल निकले।

14 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (8-12-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  2. kya bat kahi hai? ham sir peet peet kar rote rahen lekin desh ke halat bad se badtar hote ja rahe hain.
    kajal jee ne sach hi likha hai.

    उत्तर देंहटाएं
  3. ये तो इस देश की जनता को बना कर उल्लू ...हर रेस में आगे हैं निकले

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत खूब ...
    "ये तो इस देश की जनता को बना कर उल्लू ...हर रेस में आगे हैं निकले"bilkul sahi kaha anju ji

    उत्तर देंहटाएं
  5. राजनीति में घातें हैं, प्रतिघातें हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  6. सबके सब टुकड़ खोर हैं .ये मुसलामानों के चचा वो दलितों की जयललिता .राजकुमारी माया .

    उत्तर देंहटाएं
  7. वर्तमान परिस्थिति के लिए उत्तम रचना।

    उत्तर देंहटाएं

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