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सोमवार, 10 दिसंबर 2012

"दोपहरी में शाम हो गई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


नीलगगन पर कुहरा छाया, दोपहरी में शाम हो गई।
शीतलता के कारण सारी, दुनियादारी जाम हो गई।।

गैस जलानेवाली ग़ायब, लकड़ी गायब बाज़ारों से,
कैसे जलें अलाव? यही तो पूछ रहे हैं सरकारों से,
जीवन को ढोनेवाली अब, काया भी नाकाम हो गई।
जीवन को ढोनेवाली अब, काया भी नाकाम हो गई।

खुदरा व्यापारी जायेंगे, परदेशी व्यापार करेंगे, 
आम आदमी को लूटेंगे, अपनी झोली खूब भरेंगे, 
दलदल में फँस गया सफीना, धारा तो गुमनाम हो गई।
जीवन को ढोनेवाली अब, काया भी नाकाम हो गई।

सस्ती हुई ज़िन्द्गगी कितनी, बढ़ी मौत पर मँहगाई है,
संसद में बैठे बिल्लों ने, दूध-मलाई ही खाई है,
शीला की लुट गई जवानी, मुन्नी भी बदनाम हो गई।
जीवन को ढोनेवाली अब, काया भी नाकाम हो गई।

14 टिप्‍पणियां:

  1. रचना पढते पढते ठिठुरन शुरू ह गयी ...
    बहुत ही सुंदरता से बाँधा है शीत को शब्दों में ...
    नमस्कार शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार (11-12-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  3. उत्तर
    1. सुंदर लेखन,बेहतरीन ****^^^^****सस्ती हुई ज़िन्द्गगी कितनी, बढ़ी मौत पर मँहगाई है,
      संसद में बैठे बिल्लों ने, दूध-मलाई ही खाई है,
      शीला की लुट गई जवानी, मुन्नी भी बदनाम हो गई।
      जीवन को ढोनेवाली अब, काया भी नाकाम हो गई।

      हटाएं
  4. ठिठुरन बढ़ी है, सब बदला बदला लग रहा है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. नीलगगन पर कुहरा छाया, दोपहरी में शाम हो गई।
    शीतलता के कारण सारी, दुनियादारी जाम हो गई।।

    बहुत उम्दा,लाजबाब रचना,,

    उत्तर देंहटाएं

  6. खुदरा व्यापारी जायेंगे, परदेशी व्यापार करेंगे,
    आम आदमी को लूटेंगे, अपनी झोली खूब भरेंगे,
    दलदल में फँस गया सफीना, धारा तो गुमनाम हो गई।
    जीवन को ढोनेवाली अब, काया भी नाकाम हो गई।

    नंगई मुलायम माया की देखो कितनी आम हो गई .

    उत्तर देंहटाएं
  7. यथार्थ चित्रण।
    खुदरा व्यापारी जायेंगे, परदेशी व्यापार करेंगे,
    आम आदमी को लूटेंगे, अपनी झोली खूब भरेंगे,
    दलदल में फँस गया सफीना, धारा तो गुमनाम हो गई।
    जीवन को ढोनेवाली अब, काया भी नाकाम हो गई।

    उत्तर देंहटाएं

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