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मंगलवार, 12 मार्च 2013

"हाथ में खंजर उठा लिया " (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अच्छा किया जो आपने खंजर उठा लिया 
हमने भी अपने हाथ में नश्तर उठा लिया 

ज़ुल्मों-सितम की जब सभी हद पार हो गयीं 
करने को अब मुकाबला बख़्तर उठा लिया 

फौलाद सा बना लिया हमने तो मोम दिल 
काँधे पे हमने धूप का गठ्ठर उठा लिया 

हम पर्बतों के संग में करते निवास हैं 
बस इसलिए ही हाथ में पत्थर उठा लिया 

जब "रूप" पर उठी नज़र बदनीयती की थी
हमने मुकाम छोड़कर बिस्तर उठा लिया  

19 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुती,आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.

    उत्तर देंहटाएं
  3. भावनाओ से ओत -पोत बहुत उम्दा प्रस्तुति आभार

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    अर्ज सुनिये

    उत्तर देंहटाएं
  4. लाजवाब रचना, शुभकामनाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (13-03-13) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

    उत्तर देंहटाएं
  6. सच है दृढ़ता से ही जीवन सम्‍भव है।

    उत्तर देंहटाएं

  7. सादर जन सधारण सुचना आपके सहयोग की जरुरत
    साहित्य के नाम की लड़ाई (क्या आप हमारे साथ हैं )साहित्य के नाम की लड़ाई (क्या आप हमारे साथ हैं )

    उत्तर देंहटाएं

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