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शुक्रवार, 15 मार्च 2013

"हरी-भरी हैं पर्वतमाला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हरियाली का ओढ़ दुशाला।
हरी-भरी हैं पर्वतमाला।।

ऊपर आसमान नीला है,
घाटी में बहती जल धारा।
देवदार के वृक्ष झूमते,
चट्टानों ने रूप निखारा।
तन-मन को शीतलता देता,
कुदरत का ये रंग निराला।
हरियाली का ओढ़ दुशाला।
हरी-भरी हैं पर्वतमाला।।

मड़वा और गहत की खेती,
काफल हैं सबके मन भाते।
तेजपात फल-फूल रहे हैं,
अगर-तगर हैं गन्ध लुटाते।
अनुपम छटा देखकर सबका,
हो जाता है मन मतवाला।
हरियाली का ओढ़ दुशाला।
हरी-भरी हैं पर्वतमाला।।

मखमल जैसी प्यारी-प्यारी
सुन्दर लगती हैं ये सीढ़ी।
हम पहाड़ के बाशिन्दें हैं,
सीधी-सादी अपनी पीढ़ी।
इसी लिए तो शंकर जी ने,
इन शिखरों पर डेरा डाला।
हरियाली का ओढ़ दुशाला।
हरी-भरी हैं पर्वतमाला।। 

11 टिप्‍पणियां:

  1. सटीक अभिव्यक्ति-
    आभार गुरूजी-

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुंदर pic के साथ सुंदर प्रस्तुति गुरु जी

    उत्तर देंहटाएं
  3. हरियाली का ओढ़ दुशाला।
    हरी-भरी हैं पर्वतमाला।। ,,,बहुत सुन्दर पंक्तियाँ..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (16-3-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  5. हरियाली का ओढ़ दुशाला।
    हरी-भरी हैं पर्वतमाला।।
    अनुपम भाव ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. प्रकृति की सुन्दर छबि -गीत में

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर शब्द चित्र....

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुंदर अभिव्यक्ति. सच कहा आपने

    आज की मेरी नई रचना
    एक शाम तो उधार दो

    उत्तर देंहटाएं
  9. प्रकृति को नमन...सुंदर कविता..

    उत्तर देंहटाएं

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