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शुक्रवार, 29 मार्च 2013

"बादल हुआ शराबी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


रंग बरसते हैं फागुन में, पीले-हरे-गुलाबी।
फाग खेलने को आये हैं, बादल आज शराबी।।

मस्ती में ये उमड़-घुमड़कर, करते हैं मनचाही,
चन्दा के उजले माथे पर, पोत रहे हैं स्याही,
शर्म-लिहाज आज तो इनको, आती नहीं ज़रा भी।
फाग खेलने को आये हैं, बादल आज शराबी।।

सरसों फूली हुई खेत में, गेहूँ हुए सुनहरे,
फूलों-कलियों के आँगन में, भँवरे आकर ठहरे,
खोल रहे लज्जा के ताले, लेकर अपनी चाबी।
फाग खेलने को आये हैं, बादल आज शराबी।।

कलकल-छलछल बहती जाती, सरिताओं में धारा,
निर्मल जल सागर में जाकर, बन जाता है खारा,
आज प्रदूषण जन-जीवन में, करता बहुत खराबी।
फाग खेलने को आये हैं, बादल आज शराबी।।

16 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर प्रस्तुति !!
    आभार आदरणीय !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर,इन पर भी आधुनिक सभ्यता का असर हो गया है !

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत अच्छी रचना...
    मस्ती में ये उमड़-घुमड़कर, करते हैं मनचाही,
    चन्दा के उजले माथे पर, पोत रहे हैं स्याही,
    सुन्दर!!!

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (30-3-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर भावअभिव्यक्ति

    शास्त्री जी ,,,इस पोस्ट को कल के चर्चा मंच में प्रकाशित करने का कष्ट करे,,,आभार,,,

    RECENT POST: होली की हुडदंग ( भाग -२ )

    उत्तर देंहटाएं
  6. आज कल मौसम फिर से करवट ले रहा है ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह....बेहतरीन प्रभु...होली मुबारक!!

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत बढियाँ .. आप बहुत अच्छा लिखतेँ ।

    मेरा ठिकाना _>> वरुण की दुनियाँ

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत सुन्दर....होली की हार्दिक शुभकामनाएं ।।
    पधारें कैसे खेलूं तुम बिन होली पिया...

    उत्तर देंहटाएं
  10. फागुन के मद में मतवाले बादलों कि मनमानी ,,,बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...

    उत्तर देंहटाएं

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