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शनिवार, 30 मार्च 2013

"अन्तरजाल-सभी तरह का माल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


देखो कितना भिन्न है, आभासी संसार।
शब्दों से लड़ते सभी, लेकर क़लम-कटार।।

ज़ालजगत पर हो रही, चिट्ठों की भरमार।
गीत, कहानी-हास्य की, महिमा अपरम्पार।।

पण्डे-जोशी को नहीं, खोज रहा यजमान।
जालजगत पर हो रहा, ग्रह-नक्षत्र मिलान।।

नवयुग में सबसे बड़ा, ज्ञानी अन्तर्जाल।
इसकी झोली में भरा, सभी तरह का माल।।

स्वाभिमान के साथ में, रहो सदा आनन्द।
अपने बूते पर लिखो, सभी विधा सानन्द।।

19 टिप्‍पणियां:

  1. कागज कलम का स्थान अब कीबोर्ड लेता जा रहा है,बहुत ही सार्थक प्रस्तुति,आभार आदरणीय.

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  2. sundar aur sarthak prastuti, "PANDE JOSI FAIL HO GAYE, COMPUTER HAI PAS,KHUD PAR HI VISHWAS KARO,CHOD PARAYEE AAS..."

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सही कहा है आपने .सार्थक प्रस्तुति मोदी संस्कृति:न भारतीय न भाजपाई . .महिला ब्लोगर्स के लिए एक नयी सौगात आज ही जुड़ें WOMAN ABOUT MAN

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  4. बहुत सटीक रचना, सब उपलब्ध है इस अंतर्जाल पर !

    उत्तर देंहटाएं

  5. कल दिनांक 31/03/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  6. वाकई इन्टरनेट असीमित संभावनाओं का माध्यम बन चुका है, अच्छे दोहे.

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  7. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (31-03-2013) के चर्चा मंच 1200 पर भी होगी. सूचनार्थ

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  8. बहुत सही सलाह दी आपने. सुंदर दोहे.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  9. नवयुग में सबसे बड़ा, ज्ञानी अन्तर्जाल।
    इसकी झोली में भरा, सभी तरह का माल।।

    बहुत सुन्दर...

    उत्तर देंहटाएं
  10. सार्थक और सटीक दोहे महोदय .....
    साभार....

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  11. अपने बूते पर लिखो...बात में दम है...

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  12. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति!!
    पधारें कैसे खेलूं तुम बिन होली पिया...

    उत्तर देंहटाएं

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