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गुरुवार, 7 मार्च 2013

"दो मुक्तक" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

(१)
चाँदनी के बाद तो आती अंधेरी रात है।
है कहीं सूखा कहीं पर बे-वजह बरसात है।
ज़िन्दग़ी है खेल इक शतरंज का-
शह हजारों हैं यहाँ लेकिन न होती मात है।।
(२)
भूल मत करना कभी भी जानकर।
दोस्ती करना, सदा पहचान कर।
चार दिन की है जवानी सोच ले-
"रूप" पर इतना तो मत अभिमान कर।।

8 टिप्‍पणियां:

  1. भूल मत करना कभी भी जानकर।
    दोस्ती करना, सदा पहचान कर।
    चार दिन की है जवानी सोच ले-
    "रूप" पर इतना तो मत अभिमान कर।
    बहुत खूब,,,

    Recent postकाव्यान्जलि: रंग गुलाल है यारो,

    उत्तर देंहटाएं
  2. वहा बहुत खूब बेहतरीन

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में

    तुम मुझ पर ऐतबार करो ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. ज़िन्दग़ी है खेल इक शतरंज का-
    शह हजारों हैं यहाँ लेकिन न होती मात है।।
    very nice.

    उत्तर देंहटाएं

  4. (१)
    चाँदनी के बाद तो आती अंधेरी रात है।
    है कहीं सूखा कहीं पर बे-वजह बरसात है।
    ज़िन्दग़ी है खेल इक शतरंज का-
    शह हजारों हैं यहाँ लेकिन न होती मात है।।

    (२)
    भूल मत करना कभी भी जानकर।
    दोस्ती करना, सदा पहचान कर।
    चार दिन की है जवानी सोच ले-
    "रूप" पर इतना तो मत अभिमान कर।।

    अजी क्या बात है मुक्तक क्या यह तो पूरा एक रचना संसार है व्यवहार जगत की तल्खियां सच्चाइयां हैं .

    उत्तर देंहटाएं

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