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शनिवार, 9 मार्च 2013

"बासन्ती शृंगार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बौरायें हैं सारे तरुवर, पहन सुमन के हार।
मोह रहा है सबके मन को बासन्ती शृंगार।।

गदराई है डाली-डाली,
चारों ओर सजी हरियाली,
कुहुक रही है कोयल काली
नीम-बेर-बेलों पर भी आया है नया निखार।
मोह रहा है सबके मन को बासन्ती शृंगार।।

हँसते गेहूँ, सरसों खिलती
तितली भी फूलों से मिलती,
पवन बसन्ती सर-सर चलती
सबको गले मिलाने आया, होली का त्यौहार।
मोह रहा है सबके मन को बासन्ती शृंगार।।

निर्मल जल की धारा बहती,
कभी न थकती चलती रहती,
नदिया तालाबों से कहती,
"चरैवेति" पर टिका हुआ है सारा ही संसार।
मोह रहा है सबके मन को बासन्ती शृंगार।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर बसंती श्रृंगार,आभार.

    खिली कली कचनार की, दहका फूल पलाश
    नव लतिकाएँ बाँचतीं, ऋतु का नया हुलास।

    उत्तर देंहटाएं
  2. गदराई है डाली-डाली,
    चारों ओर सजी हरियाली,
    कुहुक रही है कोयल काली,

    वहा बड़ी सुन्दर और मन मोहक कविता की सरंचना की है आपने ........आभार

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    तुम मुझ पर ऐतबार करो ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बढ़िया रचना-
    उत्सव शुरू है-
    आभार गुरुदेव -

    उत्तर देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (10-03-2013) के चर्चा मंच 1179 पर भी होगी. सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुन्दर प्रकृति चित्रण महाशिवरात्रि की शुभकामनाएँ

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुंदर चित्रण बसंत का तरुवर लहलहाए फूलों के संग

    उत्तर देंहटाएं

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