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गुरुवार, 10 अक्तूबर 2013

"दोहे-राजनीति का खेल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जहाँ नेवला-साँप का, हो जाता है मेल।
कुछ ऐसा ही समझिए, राजनीति का खेल।।

रहते हरदम ताक में, कब दें किसे पछाड़।
जिसका हो वर्चस्व कुछ, लेते उसकी आड़।।

पाँच साल के बाद में, जनता आती याद।
केवल मत के वास्ते, होती है फरियाद।।

शासन-सत्ता पाय कर, भऱता अपना पेट।
सात पीढ़ियों के लिए, दौलत रहा समेट।।

घर में जिसके हो लगा, रिश्वत का बाजार।
वो कैसे जाने भला, मँहगाई की मार।।

ग़लत नीतियों का करे, जो भरपूर विरोध।
डाल रहे हैं उसी के, कदमों में अवरोध।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. न जाने क्या घटता रहता, राजनीति के आँगन में।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार गुरुवर-
    १२-२३ प्रवास पर हूँ-सादर

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार शास्त्री जी ....

    राजनीति एक भैंस है खाती है जो वोट
    रहती नेता भवन में, दुहते हैं वे नोट
    दुहते हैं वे नोट, मगर सब चोरी चोरी
    कीचड उछले लाख, चदरिया रहती कोरी
    कौवों का ही झुण्ड 'जय', कौवों की काग-नीति
    अब तो ये ही सोचिये कब उजली थी राजनीति

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - शुक्रवार - 11/10/2013 को माँ तुम हमेशा याद आती हो .... - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः33 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


    उत्तर देंहटाएं

  5. ग़लत नीतियों का करे, जो भरपूर विरोध।
    डाल रहे हैं उसी के, कदमों में अवरोध।।

    प्रासंगिक सशक्त दोहावली।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सशक्त, शुभकामनाएं.\

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  7. जहाँ नेवला-साँप का, हो जाता है मेल।
    कुछ ऐसा ही समझिए, राजनीति का खेल।।

    यही है राजनीति |
    लेटेस्ट पोस्ट नव दुर्गा

    उत्तर देंहटाएं

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